ट्रंप अपनी पिछली टर्म में मोदी के यार थे। बराबर की दोस्ती थी।
यह सेकंड टर्म में शुरू से ही पटरी नहीं बैठी ? मोदी भी ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद पहली ही यात्रा में उखड़े उखड़े नज़र आए हर मुलाक़ात में बार बार गले मिलने वाले औपचारिक रुप से हाथ मिलाते दिखे। उपर से यह ट्रंप का बार बार धमकी देना और का टेरिफ बढ़ाना ?
क्या कारण है?
१. ट्रंप ने पहले टर्म में मोदी का बढ़ता कद देखा। ग्लोबल लेवल पर मोदी के बढ़ते प्रभाव को देखा तब वे पहली बार राष्ट्रपति बने थे ट्रंप की महत्वाकांक्षा ज्यादा न थी उनके लिए सिर्फ़ अमेरिका था।
२. जब ट्रंप दूसरी बार राष्ट्रपति बने तब उनके अंदर वही महत्वाकांक्षा जाग गयी जिसके लिए मोदी ने अपनी सेकंड टर्म में भरपूर प्रयास किए
३. अब दोनो के बीच में एक अनकही अनदेखी प्रतिस्पर्धा चल गयी है वह है नोबेल पीस प्राइज़ ।
४. अगर ट्रंप न जीतते तो मोदी अकेले ही इस दौड़ में इस बार थे। मोदी ने रुस और यूक्रेन के बीच युद्ध रोकने के लिए बहुत प्रयास किये वे जेलेन्सी से मिले पुतिन से मिले अजित ढोबाल और जयशंकर प्रसाद को इस काम पर लगाया और बहुत मेहनत की। बदक़िस्मती से सफलता हाथ नही लगी। मोदी इसलिए ही अंतरराष्ट्रीय फोरम पर नपे तुले शब्दों में बोलते दिखाई दिए।
५. अभी हाल में ही ऑपरेशन सिंदूर पर भी इसलिये ही सीजफायर किया गया ताकि उनको युद्ध को बढ़ावा देने वाला न समझा जाए। कोई कितने भी कयास लगाए अगर पाकिस्तान नही भी बोलता तो वे युद्धविराम अपने से करते ही।
५. अब ट्रंप की एंट्री हो गयी । यह महाशय भी यही चाहते थे। रुस अपने घुटने पर झुके इसलिए ट्रंप ने कई प्रतिबंध लगाए । बाइडेन के समय भी प्रतिबंध लगे थे पर सख्ती से पालन नहीं हुआ उस समय पूरा यूरोप ब्रिटेन को छोड़कर कर रुस से तेल ख़रीद रहा था अन्य व्यापार भी लगभग चालू था।
६. इसलिए ट्रंप ने पूरे यूरोप व चीन भारत सहित एशिया के देशों पर टेरिफ बढ़ा दिया। पाकिस्तान को भारत के ख़िलाफ़ मजबूत करने के लिए मदद देना चालू की और युएनए में भी पाकिस्तान के हितो की रक्षा की। पाकिस्तान के लिए यह अंतरराष्ट्रीय स्थिति बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने वाली साबित हुई और उसने भरपूर फायदा उठाया।
७. ट्रंप अब नोबेल पीस प्राइज़ के प्रबल दावेदार है और वे रुस यूक्रेन युद्ध समाप्त करने के लिए हर संभव कोशिश कर रहे हैं । भारत रुस से तेल व अन्य सब कुछ खरीदने वाला बड़ा ग्राहक है मोदी ने चालाकी से डॉलर पर से इस व्यापार की निर्भरता हटाने के लिए रुपये व रुबल में व्यापार शुरू कर दिया है । भारत यह यूरोप व एशियाई देशों के साथ रुपये व उनकी मुद्रा में विनिमय कर रहा हैं इसलिए भी अमेरिका सख़्त नाराज़ है क्योंकि हो सकता हैं विनिमय दर अधिक है या बढ़ रही है पर पहले के मुक़ाबले हमारी और अन्य देश जो हमसे जुड़े है उनकी डॉलर पर निर्भरता आधी भी नही रही है।
८. इसलिए ट्रंप मोदी से अबकी बार भयानक रुप से नाराज़ है । और वह हर संभव कोशिश करता है कि मोदी की विश्वसनीयता को भारत में व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नीचे कर सके और अपनी विश्वसनीयता बनाए रखे ।
९. अगर आपने नोटिस किया हो तो ट्रंप इज़रायल इराक वार में उलझा और इराक पर मिसाइल दागी। प्रत्युत्तर में इराक ने अमेरिकी सैन्य बेस पर ईरान में ज़बरदस्त हमला किया व भारी नुक़सान पहुँचाया । लेकिन अमेरिका ने अपनी आदत के खिलाफ पलट कर हमला नहीं किया।बल्कि ट्रंप ने घोषणा की वे बदला नहीं लेंगे और आगे हमला नहीं करेंगे खुद ही सीजफायर कर दिया जैसे मोदी ने किया ।
१०. क्योंकि यह युद्ध में भागीदारी नोबेल पीस प्राइज़ में रुकावट बन सकती थी।
११. अब ट्रंप बौखला गये हैं और गलती पर गलती कर रहे हैं टेरिफ बढ़ने से अमेरिका को ही नुक़सान है और वहाँ के नागरिकों को जब मँहगी चीज़े खरीदनी होंगी तो वे ट्रंप पर नाराज़ होगे. आमतौर से बहुत से लोग यह आकलन कर रहे हैं कि टेरिफ बढ़ने से वस्तुओं का आयात अमेरिकी कम करेगें और यहाँ बेरोज़गारी बढ़ेगी । लेकिन यह भूल जाते है कि अमेरिकी इकोनॉमी वहाँ रह रहे भारतीयों से चलती है वे डॉक्टर हैं साफ्टवेयर इंजिनियर हैं नासा में ५०% भारतीय इंजीनियर है और लेबर फोर्स एअरपोर्ट रेलवे स्टेशन मेट्रो पब्लिक सेनिटरी सर्विसेज नर्सिंग उबेर अमेजॉन गूगल माइक्रोसॉफ़्ट सब हमारे दम पर चलता हैं । जब इनको दाल चावल आटा मसाले जैसी चीज़ें चौगुने दाम पर लाना पड़ेगी तो इन सब एम्प्लायर को सेलेरी बढ़ानी पड़ेगी क्योंकि वहाँ सेलेरी कन्यूमर प्राइज़ इंडेक्स से लिंक है और जब ज्यादा वेतन देगें तो इन कम्पनियों का मुनाफा आधा रह जाएगा और जब मुनाफा नही होगा तो ट्रंप को जो टेरिफ से कमाई हो रही है वह कम्पनियों से टैक्स न मिलने के कारण बराबर भी हो सकती हैं और घाटा भी हो सकता पब्लिक नाराज़ होगी वह अलग।
११. भारत एक बहुत बढ़ा देश है और लोकल मार्केट स्ट्रांग है सरकार की वोकल फॉर लोकल व मेक इन इंडिया पॉलिसी है और अन्य ऐशियाई देशो में ब्म्होस मिसाइल्स से लेकर बासमति चाइना तक का व्यापार है। इसलिए हमको अमेरिकी टेरिफ से कुछ फर्क नही होने वाला हैं ।
१२. ट्रंप जो गलती जोश जोश में कर रहे हैं इसके परिणाम अगले छः महीने में दिखने लगेंगे और अमेरिकी इकोनॉमी अपने समय का सबसे बड़ा क्रेश देखने वाली है।
१३. वैसे मैंने पढ़ा है कि ट्रंप के ओवल ऑफिस ने नोबेल पीस प्राइज के लिए ट्रंप की विश्व पटल पर शांति के प्रयासों को गिनाते हुए आवेदन खुद ही भिजवाया है ।
१४. मुझे लगता हैं कि अब मोदी ने नोबल पीस प्राइस का ख्याल छोड़ दिया हैं और वे अपने रिटायरमेंट की तैयारियाँ में लगे हैं । ७५ वर्ष की उम्र के बाद पद से रिटायरमेंट का पार्टी में निर्णय उनका ही था। इसलिए वे जल्द ही अपने उत्तराधिकारी का चयन कर सत्ता सौप देगें। जिससे आने वाले नेतृत्व के अंदर २०२९ का चुनाव लड़ने का पूरा समय व अनुभव मिल सकें ।
१३. यह विश्लेषण वैश्विक स्थिति का है राजनीतिक नही है। इसलिए अन्यथा टिप्पणी न करें ।













































