गुरुवार, 7 अगस्त 2025

Trump & Tariff


ट्रंप अपनी पिछली टर्म में मोदी के यार थे। बराबर की दोस्ती थी।

यह सेकंड टर्म में शुरू से ही पटरी नहीं बैठी ? मोदी भी ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद पहली ही यात्रा में उखड़े उखड़े नज़र आए हर मुलाक़ात में  बार बार गले मिलने वाले औपचारिक रुप से हाथ मिलाते दिखे। उपर से यह ट्रंप का बार बार धमकी देना और का टेरिफ बढ़ाना ?


क्या कारण है?

१. ट्रंप ने पहले टर्म में मोदी का बढ़ता कद देखा। ग्लोबल लेवल पर मोदी के बढ़ते प्रभाव को देखा तब वे पहली बार राष्ट्रपति बने थे ट्रंप की महत्वाकांक्षा ज्यादा न थी उनके लिए सिर्फ़ अमेरिका था।

२. जब ट्रंप दूसरी बार राष्ट्रपति बने तब उनके अंदर वही महत्वाकांक्षा जाग गयी जिसके लिए मोदी ने अपनी सेकंड टर्म में भरपूर प्रयास किए

३. अब दोनो के बीच में एक अनकही अनदेखी प्रतिस्पर्धा चल गयी है वह है नोबेल पीस प्राइज़ । 



४. अगर ट्रंप न जीतते तो मोदी अकेले ही इस दौड़ में इस बार थे। मोदी ने रुस और यूक्रेन के बीच युद्ध रोकने के लिए बहुत प्रयास किये वे जेलेन्सी से मिले पुतिन से मिले अजित ढोबाल और जयशंकर प्रसाद को इस काम पर लगाया और बहुत मेहनत की। बदक़िस्मती से सफलता हाथ नही लगी। मोदी इसलिए ही अंतरराष्ट्रीय फोरम पर नपे तुले शब्दों में बोलते दिखाई दिए।

५. अभी हाल में ही ऑपरेशन सिंदूर पर भी इसलिये ही सीजफायर किया गया ताकि उनको युद्ध को बढ़ावा देने वाला न समझा जाए। कोई कितने भी कयास लगाए अगर पाकिस्तान नही भी बोलता तो वे युद्धविराम अपने से करते ही।

५. अब ट्रंप की एंट्री हो गयी । यह महाशय भी यही चाहते थे। रुस अपने घुटने पर झुके इसलिए ट्रंप ने कई प्रतिबंध लगाए । बाइडेन के समय भी प्रतिबंध लगे थे पर सख्ती से पालन नहीं हुआ उस समय पूरा यूरोप ब्रिटेन को छोड़कर कर रुस से तेल ख़रीद रहा था अन्य व्यापार भी लगभग चालू था। 

६. इसलिए ट्रंप ने पूरे यूरोप व चीन भारत सहित एशिया के देशों पर टेरिफ बढ़ा दिया। पाकिस्तान को भारत के ख़िलाफ़ मजबूत करने के लिए मदद देना चालू की और युएनए में भी पाकिस्तान के हितो की रक्षा की। पाकिस्तान के लिए यह अंतरराष्ट्रीय स्थिति बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने वाली साबित हुई और उसने भरपूर फायदा उठाया।


७. ट्रंप अब नोबेल पीस प्राइज़ के प्रबल दावेदार है और वे रुस यूक्रेन युद्ध समाप्त करने के लिए हर संभव कोशिश कर रहे हैं । भारत रुस से तेल व अन्य सब कुछ खरीदने वाला बड़ा ग्राहक है मोदी ने चालाकी से डॉलर पर से इस व्यापार की निर्भरता हटाने के लिए रुपये व रुबल में व्यापार शुरू कर दिया है । भारत यह यूरोप व एशियाई देशों के साथ रुपये व उनकी मुद्रा में विनिमय कर रहा हैं इसलिए भी अमेरिका सख़्त नाराज़ है क्योंकि हो सकता हैं विनिमय दर अधिक है या बढ़ रही है पर पहले के मुक़ाबले हमारी और अन्य देश जो हमसे जुड़े है उनकी डॉलर पर निर्भरता आधी भी नही रही है।

८. इसलिए ट्रंप मोदी से अबकी बार भयानक रुप से नाराज़ है । और वह हर संभव कोशिश करता है कि मोदी की विश्वसनीयता को भारत में व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नीचे कर सके और अपनी विश्वसनीयता बनाए रखे ।

९. अगर आपने नोटिस किया हो तो ट्रंप इज़रायल इराक वार में उलझा और इराक पर मिसाइल दागी। प्रत्युत्तर में इराक ने अमेरिकी सैन्य बेस पर ईरान में ज़बरदस्त हमला किया व भारी नुक़सान पहुँचाया । लेकिन अमेरिका ने अपनी आदत के खिलाफ पलट कर हमला नहीं किया।बल्कि ट्रंप ने घोषणा की वे बदला नहीं लेंगे और आगे हमला नहीं करेंगे खुद ही सीजफायर कर दिया जैसे मोदी ने किया ।

१०. क्योंकि यह युद्ध में भागीदारी नोबेल पीस प्राइज़ में रुकावट बन सकती थी।

११. अब ट्रंप बौखला गये हैं और गलती पर गलती कर रहे हैं टेरिफ बढ़ने से अमेरिका को ही नुक़सान है और वहाँ के नागरिकों को जब मँहगी चीज़े खरीदनी होंगी तो वे ट्रंप पर नाराज़ होगे. आमतौर से बहुत से लोग यह आकलन कर रहे हैं कि टेरिफ बढ़ने से वस्तुओं का आयात अमेरिकी कम करेगें और यहाँ बेरोज़गारी बढ़ेगी । लेकिन यह भूल जाते है कि अमेरिकी इकोनॉमी वहाँ रह रहे भारतीयों से चलती है वे डॉक्टर हैं साफ्टवेयर इंजिनियर हैं नासा में ५०% भारतीय इंजीनियर है और लेबर फोर्स एअरपोर्ट रेलवे स्टेशन मेट्रो पब्लिक सेनिटरी सर्विसेज नर्सिंग उबेर अमेजॉन गूगल माइक्रोसॉफ़्ट सब हमारे दम पर चलता हैं । जब इनको दाल चावल आटा मसाले जैसी चीज़ें चौगुने दाम पर लाना पड़ेगी तो इन सब एम्प्लायर को सेलेरी बढ़ानी पड़ेगी क्योंकि वहाँ सेलेरी कन्यूमर प्राइज़ इंडेक्स से लिंक है और जब ज्यादा वेतन देगें तो इन कम्पनियों का मुनाफा आधा रह जाएगा और जब मुनाफा नही होगा तो ट्रंप को जो टेरिफ से कमाई हो रही है वह कम्पनियों से टैक्स न मिलने के कारण बराबर भी हो सकती हैं और घाटा भी हो सकता पब्लिक नाराज़ होगी वह अलग।


  ११. भारत एक बहुत बढ़ा देश है और लोकल मार्केट स्ट्रांग है सरकार की वोकल फॉर लोकल व मेक इन इंडिया पॉलिसी है और अन्य ऐशियाई देशो में ब्म्होस मिसाइल्स से लेकर बासमति चाइना तक का व्यापार है। इसलिए हमको अमेरिकी टेरिफ से कुछ फर्क नही होने वाला हैं ।

१२. ट्रंप जो गलती जोश जोश में कर रहे हैं इसके परिणाम अगले छः महीने में दिखने लगेंगे और अमेरिकी इकोनॉमी अपने समय का सबसे बड़ा क्रेश देखने वाली है।



१३. वैसे मैंने पढ़ा है कि ट्रंप के ओवल ऑफिस ने नोबेल पीस प्राइज के लिए ट्रंप की विश्व पटल पर शांति के प्रयासों को गिनाते हुए आवेदन खुद ही भिजवाया है ।

१४. मुझे लगता हैं कि अब मोदी ने नोबल पीस प्राइस का ख्याल छोड़ दिया हैं और वे अपने रिटायरमेंट की तैयारियाँ में लगे हैं । ७५ वर्ष की उम्र के बाद पद से रिटायरमेंट का पार्टी में निर्णय उनका ही था। इसलिए वे जल्द ही अपने उत्तराधिकारी का चयन कर सत्ता सौप देगें। जिससे आने वाले नेतृत्व के अंदर २०२९ का चुनाव लड़ने का पूरा समय व अनुभव मिल सकें । 

१३. यह विश्लेषण वैश्विक स्थिति का है राजनीतिक नही है। इसलिए अन्यथा टिप्पणी न करें ।



गुरुवार, 12 दिसंबर 2024

तलाक तलाक तलाक


एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर अतुल  ने अपनी पत्नी व ससुराल वालो की प्रताड़ना से तंग आकर आत्महत्या कर ली। यह कुछ आश्चर्यजनक नही है। ख़ासतौर पर जहाँ पत्नी के माता-पिता उसका आँख बंद कर पक्ष लेते हो वहाँ समस्या विकराल हो जाती है इस पर 'एक तो करेला, दूसरा नीम चढ़ा' वाली कहावत चरितार्थ करते हुए एक फैमिली कोर्ट की महिला जज उसका नज़रिया भी ठीक नही है किसी भी व्यक्ति को उसके humiliation के अंतिम छोर तक पहुँचा देता हैं जिसके आगे पढ़े लिखे व्यक्ति को भी रास्ता नहीं सूझता।

आइये सबसे ज़रूरी पहली बात समझेः

ज्यूडीशरी क्यों महत्वपूर्ण है और जज की क्या भूमिका है? 

जब पारिवारिक प्रकरण में पति पत्नी फैमिली कोर्ट में जाते है तो जज का काम दोनों पक्षों की पारिवारिक पृष्ठभूमि समझना पति व पत्नी के परिवार की आर्थिक स्थिति समझना और जो सबूत कोर्ट में रखे जाते हैं जो बाते कही जाती हैं उससे परे यह समझना कि कौन सच बोल रहा हैं कौन झूठ और फिर प्रकरण को आगे बढ़ाना। आजकल के बहुत से जज न तो इस बात को समझते है न ही शायद उन्हें ट्रेनिंग में बताया जा रहा है। 

यदि कोर्ट में सिर्फ़ फैक्ट से ही काम चलता है तो जज की जरुरत नही है कम्प्यूटर में फैक्ट फीड करो दो मिनट में जजमेंट निकल आयेगा।

इसलिए ही जज बहुत जरुरी है। ख़ासतौर पर तलाक़ के प्रकरण में जज को यह समझना बहुत ज़रूरी है कि दोनो पक्ष अत्यधिक तनाव में होते हैं। कई हार उनकी सोचने समझने की शक्ति भी नहीं रहती अक्सर पीडीत पक्ष के पास सबूत नही होते उसका वकील भी कमजोर हो सकता है और इसलिए जज को सहानुभूति पूर्वक प्सरकर को ठीक से समझना होता है उसी अनुसार पक्षो को गाइड करना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य से कोर्ट में केस लम्बे चलते है और जज बार बार बदलते रहते हैं । कभी पीड़ित व्यक्ति के फेवर में सबूत नही है लेकिन आदमी सच बोल रहा है तो बुद्अधमा जज अपने जजमेंट में कहीं न कहीं उसके लिए जगह दे देता है या कुछ लाभ तो दे ही देता है। 


दूसरी प्राइमरी बात 498A प्रकरणों में यह है कि पत्नी बढ़ चढ़ कर आरोप लगाती है कि हमने इतने लाख का गोल्ड दिया है केश दिया है मेरिज हॉल व पार्टी और सबमे इतना पैसा दिया है लेकिन एक भी पति पक्ष का वकील ना जज पत्नी पक्ष से सवाल करता है कि आपके पिता की क्या हैसियत है उनकी सेलरी कितनी है कितना पैसा वे अपनी फैमिली चलाते हुए शादी के लिए बचा सकते थे और यह सब जो बता रही है उसके बिल कोर्ट में पेश करे। यदि ऐसा हो तो दहेज के प्रकरण 498A जिसमें कई लोगों को मैंने परिवार सहित जेल जाते देखा है बच जाये।

एकऔर बात पेरेटिंग से तालुक रखती है हर माता-पिता अपने बच्चों को NEET IIT कराने के चक्कर में हर समय बच्चे को ट्यूशन, कोचिंग,  कोटा जैसी जगहो पर प्राइमरी से ही इतना पीछे लगते है कि जैसे तैसे बच्चा IIT पास कर लेगा तो जीवन सुधर जाएगा। मैं जितने भी ऐसे सॉफ्टवेयर इंजीनियर या डॉक्टर या ऐसे लोगों को जानता हूँ उनके पास सिर्फ़ पैसा है पर दुनियादारी को समझने की अकल नहीं। ये ही लोग साइबर क्राइम, डिजिटल अरेस्ट के शिकार होते हैं। वे बहुत बड़े स्टेटस में है तो वे ही माता-पिता अब उनके स्टेटस के अनुसार नही है और इसलिए या तो वे साथ रहते नही रखते नहीं और कभी किसी को बच्चे का साथ रहने को मिलता है और घर में किटी पार्टी है गेस्ट आ रहे है तो माता-पिता को इंस्ट्रक्शन होता है वे अपने कमरे में रहे बाहर न आए वरना उनकी इज्जत में इज़ाफ़ा कम हो जाएगा।यह सब अपनी दुर्गति तो कराना ही है साथ में बच्चे का भविष्य भी खराब करना है। 

क्यों? दरअसल इसलिए कि जो बच्चे सारी ज़िंदगी पढ़ते रहते है उनको दुनिया दारी नही आती उनके विपरीत परिस्थितियों की न तो समझ है न निपटना आता हैं।

इसलिए यह बहुत ज़रूरी है कि यदि आप बच्चे को ज्यादा पढ़ाना लिखाना चाहते है तो उसको पारिवारिक संस्कार भी दे और बच्चे को गली मोहल्ले में दूसरे बच्चों के साथ खेलने भी दे। उसको मिट्टी में गिरने दे चोंट लगने दे। मुझे याद है हम रोज शाम को धूल धूसरित होकर आते है और आये दिन कभी हमारे घुटने छिले होते थे तो कभी अंगूठा में से खून निकल रहा होता था। बच्चे का स्ट्रीट स्मार्ट होना बहुत जरुरी है।


आखिरी बात यह है कि एक तलाक के केस को निपटना इतना मुश्किल भी नही है यदि आप स्ट्रीट स्मार्ट  है। तब आप ऐसी कितनी ही कठिन परिस्थितियों से आसानी ले निपट सकते है। यह सब दबाव झेल सकते हैं ।


 लेकिन अतुल जैसे लोग ज़िंदगी की पर्याप्त समझ न होने विषम परिस्थिति में ज़िन्दगी से हार जाते है।


शुक्रवार, 8 नवंबर 2024

ट्रम्प की जीत के मायने!


सारी दुनिया की निगाहें इस बार अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव पर लगी हुई थी। सबके अपने अपने निजी कारण थे।

1. सबसे पहले यूक्रेन व रशिया के बीच कभी न ख़त्म होने वाले युद्ध सिर्फ़ अमेरिका के सपोर्ट के कारण दो साल से चल रहा था। 

2. दरअसल अमेरिका की इकॉनॉमी का 70% हथियारों से आता है यहाँ फाइटर जेट से लेकर मशीनगन तोपें मिसाइल असाल्ट रायफ़ल्स पिस्टल हेलमेट जिनमें अंधेरे में देख सकने से लेकर सारे सेंसर लगे होते है गरज यह कि हर कुछ वहाँ से खरीदा जा सकता है । 

3. यह हथियार निर्माता चाहते है कि दुनिया में युद्ध चलते रहे और इसलिए उनकी एक बड़ी लॉबी ऐसा राष्ट्रपति चाहते है जो आग में घी डालता रहे।


4. 1960 से शीत युद्ध के दौरान प्रो वेस्ट साउथ विएतनाम को सैन्य मदद करता रहा। लाखो अमेरिकी सैनिक हर साल वहाँ जा रहे थे हर किस्म के हथियार भी कार्गो हवाई जहाज ले जा रहे थे पहली बार वहाँ नेपाम बम उपयोग में लाये गये जिससे सिर्फ़
आग लग जाती थी। उत्तरी विएतनाम ने हो चि मिन्ह के नेतृत्व में अंततः 1975 में दक्षिण विएतनाम को मिलाकर एकीकरण कर दिया यह अमेरिका की बहुत बड़ी हार थी। 



5. यह अफ़ग़ानिस्तान में दोहराया गया पहले अफ़ग़ानिस्तान को मदद की गयी रशिया के खिलाफ रशिया के वहाँ से हटने के बाद तालिबान स्थापित हुए फिर 9/11 हुआ और अमरीकी सैनिक अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के खिलाफ उतरे अंततः हार कर वापिस आ गये

6. अब यूक्रेन रशिया युद्ध तो चल ही रहा है इज़राइल हमास हिज़्बुल्लाह इराक़ लेबनान सब बेतहाशा फुल स्केल वार में शामिल है।



7. अमेरिकी हथियार निर्माताओं की पो बारह है और इसलिए ही ट्रम्प के पिछले चुनाव में उनको हराने व कठपुतली राष्ट्रपति बनाने के लिए बाइडेन को जीताने मे सारी ताकत लगा दी थी व सफल भी हुऐ थे।

8. ट्रम्प एक व्यापारी है लेकिन इसके बावजूद अमेरिका को लेकर उनकी पॉलिसी स्पष्ट है। वे शरणार्थियों व विदेशियों के लेकर उदारवादी नही है। अमेरिका का पूरी दुनिया में अलग-अलग जगहो पर युद्ध में शामिल होना और अमेरिकी सैनिकों का उसमें अकारण जान गँवाना भी उन्हें पंसद नही है।


9. इस बार उन्होंने गलती नही की और चुनाव में अपने ख़िलाफ़ नेगेटिव नेरेटिव सेट नही होने दिया जो कि हथियार लॉबी की मदद से वामपंथी विचारधारा के लोग करते हैं बिलकुल भारत की तरह की संविधान खतरे में है, देश बेच देंगे, सेक्युलरिज्म को ख़त्म कर देंगे राजदीप सरदेसाई के अनुसार इस्लामोफोबिया कर देंगे।



10. अब यूक्रेन को मिलने वाली मदद कम हो जायेगी और यूक्रेन को रशिया से जल्द समझौता करना होगा।

11. नाटो देश शांत हो कर राहत की सांस लेंगे क्योंकि उनके उपर मंडरा रही युद्ध की विभीषिका ख़त्म हो जायेगी । सुरक्षा के नाम पर उनको बेचे जा रहे हथियारों की ख़रीद की अब उनको जरुरत नही रहेगी। वे आर्थिक तरक़्क़ी की तरफ बढ़ेंगे।

12. ट्रम्प व मोदी में एक समानता है कि वे वामपंथी विचारधारा या अगर कुछ प्रबुद्ध लोग जो डीप स्टेट के बारे में समझते है उसके इशारों पर चलने वाले लोग नही है।

13. मोदी ने अपने पहले दो कार्यकाल में वादे तो बहुत किये परंतु निभा नही पाये। धारा 370 हटाने व ट्रिपल तलाक़ क़ानून के अलावा वे एक भी भ्रष्टाचारी को सजा नही दिलवा पाए। लालू यादव जैसे सजायाफ्ता लोग जमानत पर फ़ाइव स्टार ज़िंदगी जी रहे है अरविंद केजरीवाल की टीम जेल में मसाज करवा रहे है होटल से खाना खा रहे है कुछ नही हुआ। हेमंत सोरेन भी बाहर घूम रहे है। अजित पंवार से समझौता बहुत मँहगा पड़ा इस लोकसभा चुनाव में और चंद्रा बाबू नायडू को क्लीन चिट मिल ही गयी है इसके अलावा कई भ्रष्टाचार के आरोप वाले नेताओ को पार्टी में बग़ैर उनकी रणनीतिक योग्यता के लेना भारी पड़ गया। दलित व मुस्लिम वोट भाजपा से पूरी तरह छिटक गया है और सबका साथ सबका विकास लेकिन बहुत से अपर कास्ट, दलित मुस्लिम का विश्वास नही के कारण 244 पर सिमट लिए।




14. इसके अलावा नरेंद्र मोदी और उनकी टीम अपने ख़िलाफ़ नेगेटिव नेरेटिव की काट करने में विफल रही। सोशल मिडिया आई टी सेल ना तो आक्रामक रहे ना ही डिफेंड कर पाए।

15.इसमें कोई संदेह नही की ट्रम्प की जीत में इस बार सबसे बड़ा योगदान अमेरिकी हिंदू वोट का रहा जो पिछली बार से 9% ज़्यादा मिले। 

16. ट्रम्प की जीत के मायने यह है कि हँलाकि 2029 का चुनाव नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में नहीं लड़ा जाएगा लेकिन भाजपा की जीत काफी हद तक निश्चित है। इस अमेरिकी चुनाव में हिंदू वोटों की एकजुटता से भारत के हिंदू वोट भी एक जुट होने जा रहे है। 

17. इसका ट्रायल अब महाराष्ट्र, झारखंड व यूपी के उप चुनाव में देखने को मिल सकता है। 



मंगलवार, 6 अगस्त 2024

क्या भारत में तख्ता पलट हो सकता है?


बांग्लादेश देश की इकॉनॉमी पाकिस्तान श्रीलंका और कई देशों से अच्छी थी। फिर वहाँ क्यों आरक्षण पर इतना विवाद और प्रोटेस्ट हुआ कि श्रीलंका की तरह पब्लिक सड़कों पर उतर आयी संसद व प्रधानमंत्री आवास तक चली गयी। 

जिस तरह से लोग कुर्सियाँ पंखे सोफे लूट लूट कर ले जा रहे थे उसने मुझे ३१ अक्टूबर १९८४ में इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद इंदौर में पब्लिक को सरदार घरों में से सामान लूट कर ले जाते देखा था। उनकी लड़कियाँ महिलाएँ ऐसे ही घर के दरवाज़ों में सोफे व सामान लगा लगा कर चिल्ला रही थी लोग जलते टायर उनके घरो में फेंक रहे थे। यह राजनैतिक अराजकता है जब पुलिस और सेना भी दंगाइयों के साथ खड़ी नही भी होती हैं तो कुछ करती भी नहीं। 


आखिर छोटी मोटी घटनाओं के बाद अचानक ऐसा बवाल क्यों मचता है ये कौन लोग हैं जो अचानक सड़कों पर उतर आते है और देखते ही देखते तख्ता पलट कर देते है। याद करें एक अमेरिकी पुलिस वाले ने एक अफ्रीकी मूल के व्यक्ति को अरेस्ट किया था उसके हाथापाई करने पर उसे गिरा कर बूट उसके मुँह पर रखा और यह विडियो फोटो “ Blake live’s matters “ करके इतना प्रचारित हुआ कि ट्रम्प चुनाव जीतते जीतते हार गये।


इंदिरा गाँधी हमेशा सेना द्वारा तख़्ता पलट को लेकर सशंकित रहती थीं। इंदिरा गांधी विश्वस्त व्यक्तियों को प्राथमिकता से हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठता को नज़रअंदाज़ करके चीफ़ जस्टिस नियुक्त करती थी। सेना के प्रमुख पदो पर भी नियुक्तियों में वरिष्ठता के बजाय विश्वसनीय लोगो पर ध्यान होता था। यहाँ तक भी उनके कार्यकाल में राष्ट्रपति भी उनके विश्वस्त व्यक्ति ही थे। हालाँकि उनके राजेंद्र धवन जैसे सलाहकार हमेशा कहते थे कि भारत एक विशाल देश है और इसमें तख्ता पलट संभव नहीं है। सेना के तीन विभाग है और वे अलग-अलग है और भी अलग-अलग परिस्थितियाँ है। शायद इसलिए ही चीफ़ ऑफ आर्मी स्टॉफ की पोस्ट भी हमेशा खाली रही। उन्होंने सिर्फ़ एक गलती की वो यह की ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार के बाद सिक्योरिटी वार्निंग के बाद भी निजी सुरक्षा गॉर्डो की वेटिंग नही की।


मुझे लगता है कि यह मिथ ही है कि आज भारत में तख्ता पलट नहीं हो सकता है। नरेंद्र मोदी उसी राह पर चल रहे है जिस पर हसीना शेख चली। यह फील गुड फेक्टर और बार बार भ्रष्टाचार को मिटाने के वादे करना लेकिन धरातल पर वे एक भी बड़े राजनीतिक भ्रष्टाचारी पर निर्णायक बिन्दु तक केस नहीं पहुँचा सके। ज्यूडीशरी पर नरेंद्र मोदी का कोई नियंत्रण नहीं है। यह कैसा न्याय तंत्र है की चीफ जस्टिस की चलती अदालत के बीच मनु संघवी पवन खेड़ा की बेल अप्लाय करते है और १० मिनट में जमानत मिल जाती हैं । तीस्ता सितलवाड की बेल हाईकोर्ट कैंसिल करता है छुट्टी के दिन शाम ७ बजे बीच भरतनाट्यम डांस प्रोग्राम से उठ कर चीफ़ जस्टिस आते है व जमानत दे कर फिर नाच देखने चले जाते है। वहीं दूसरी और बिहार का मनीष बार बार सुप्रीम कोर्ट जाता है उसे वह सुनने के लिए ही तैयार नही उसको १० महीने बाद जमानत मिलती हैं।


प्रधानमंत्री भी देश के एडमिनिस्ट्रेटर है वे कोई सवाल नही करते चीफ़ जस्टिस से? पब्लिक फोरम पर तो ऐसी विसंगति के बारे में बोल सकते है? दिल्ली के शीशमहल शराब घोटाले वाड्रा के डीएलएफ के जमीन घोटाले नेशनल हेरल्ड के व राहुल की ब्रिटेन की नागरिकता आदि ऐसे विषय है जिनमें डॉक्यूमेंटरी एविडेंस है लेकिन सालो से ये ही लोग दबा कर बैठे हैं । अब नरेन्द्र मोदी को लगता है की जीवन में जो कुछ अचिव करना था उससे ज़्यादा मिल गया है। अब बस नोबेल पीस प्राइज़ और मिल जाये बहुत है। 


लेकिन वर्तमान हालात और देश में राहुल गांधी की बढ़ती लोकप्रियता ख़ासतौर पर लगभग सभी वर्ग के लोग व जातियों का साथ देख कर ऐसा लगता है नरेंद्र मोदी के हाथ से सत्ता फिसलती जा रही है।

Team Modi अब उनके ख़िलाफ़ चलाये जा रहे नरेटिव का जवाब नहीं दे पा रहे। आई टी सेल निष्क्रिय है ज्यूडीशरी पर नियंत्रण नही है और यह लापरवाही एक अच्छी सरकार को ले डूबेगी।

#narendramodi_primeminister

#NarendraModi

#AmitShah

#RahulGandhi

नोटः- यह विशुद्ध मेरे विचार से वर्तमान हालात पर विश्लेषणात्मक टिप्पणी है इसका किसी पार्टी पोलिटिक्स से लेना देना नहीं है।



गुरुवार, 7 सितंबर 2023

नरेन्द्र मोदी क्वीन्स गेम्बिट d4

 कुछ दिनो से वन नेशन वन इलेक्शन भारत बनाम इंडिया सनातन का शोर सोशल मीडिया पर छिड़ा है।

दरअसल न तो राजनीतिक दल न आम सोशल मीडिया के बुद्धिजीवी यह समझ पा रहे है कि यह २०२४ के चुनाव की राजनीतिक बिसात पर नरेन्द्र मोदी ने क्वीन्स गेम्बिट खेलते हुए अपना पहला प्यादा d4 आगे बढ़ा दिया है।

अगर आप गौर से आकलन करे तो मोदी ने अलायंस के मुम्बई में मज़बूत होते विपक्ष के धर्रे धर्रे उड़ा दिये। सबसे पहले उन्होंने बीच मीटिंग के विशेष संसद सत्र बुलाने की घोषणा की मुम्बई मीटिंग को छोड़कर सारे चैनल इसी में व्यस्त रहे शाम होते होते आजतक ने स्कूप निकाल लिया और अंजना ओम कश्यप ने हल्ला बोल वन नेशन वन इलेक्शन से शुरु किया ज़ाहिर है लीक पीएमओ से आया होगा कि यह वन नेशन वन इलेक्शन के बारे में है। दो दिन  तक टीवी पर बहस चलती रही मुम्बई में अलायंस की मीटिंग को कोई कवरेज नही मिला।

अभी उससे आप निकले भी नही थे की G20 Bharat के सिर्फ़ एक आमंत्रण कार्ड पर प्रेसिडेंट ऑफ भारत लिखा देखकर जयराम रमेश ने उड़ता तीर लपक लिया । कांग्रेस ने जब अपने अलायंस का नाम INDIA रखा तो मोदी क्या मूर्ख है जो उसका प्रचार करेंगे । आप को सही मे कुछ नही बोलना था परंतु पहले जयराम रमेश फिर पूरा विपक्ष कूद गया। दो दिन से सारे टीवी चैनल डिबेट करते घूम रहे है।



देश  में सर्वे हो रहा है हर हिंदुस्तानी बोल रहा है भारत नाम सही है। इसका मतलब समझ रहे है आप देश के सामने कांग्रेसी जब भारत नाम का विरोध करते है तो कांग्रेस की भारत विरोधी छवि बनती हैं ।। अभी तक आप जाति गत  वोट जो ज़्यादातर एक ही जगह वोट करते है उनके हितो की बात करके चुनाव जीतते आए है। फिर हिंदू भी अनेक जातियों में बँटे है इसलिए जातिवाद के आधार पर प्रत्याशी के अनुसार भी वोट बँट जाते है।  रही सही कसर उदयनिधी ने पूरी कर दी। उन्होंने जो बोला सो बोला प्रियांक खरगे को बोलने की क्या जरुरत थी सब बग़ैर सोचे समझे कूद गये। 





आप लोगो नही समझे कि देश में ८० करोड़ सनातनी है यह वोटर अगर आपसे नाराज हो कर एक जगह इकट्ठा हो गया तो अगले १०० साल आप जीत नही सकते। दरअसल सारा विपक्ष मोदी की ताल पर नाच रहा है वे मोदी की आलोचना करते है गाली बकते है लेकिन वे राजनीति की बिसात पर क्या चाल चलेंगे आप नही समझते है। 

अभी तो विशेष संसद सत्र आगे है।

०इब्तिदा-ए-इश्क़ है रोता है क्या, आगे-आगे देखिए होता है क्या”

बुधवार, 22 मई 2019

भारत में चुनाव प्रक्रिया और ईवीएम का सच

अब चुनाव सम्पन्न हो गये है एक्सिट पोल भी आ रहे है लेकिन एक जो बात खासतौर से विपक्ष करने में लगा हुआ है वो यह कि ईवीएम में गड़बड़ की जा सकती है या फिर ईवीएम हेक हो सकती है इससे चुनाव परिणाम प्रभावित हो सकते है। वैसे जो भी हार रहा है वो अपनी हार स्वीकार करने के बजाय उस हार का ठीकरा कहीँ और फोड़ना चाहता है लेकिन फिर भी दुष्प्रचार से कभी कभी सामान्य जन जो चुनाव प्रक्रिया से वाकिफ नही है सोचने लगते है कि हो सकता है ईवीएम में हेराफेरी की गयी हो वरना कोई पार्टी आज के जमाने में 350-400 सीट से कैसे जीत सकती है।
मै यह बताना चाहता हूँ कि मेरे शासकीय सेवा काल में मैने लगभग सभी लोकसभा व विधान सभा चुनाव में अनेक पदो पर सक्रियता से कार्य किया है खासतौर से प्रोटोकॉल ऑफिसर के पद पर लोकसभा व विधान सभा दोनो ही चुनाव में बाहर से आये आईएएस ऑबजरवर के साथ काम करना बड़ा चुनौती पूर्ण है। दरअसल जिले में होने वाले सम्पूर्ण चुनाव के प्रोसिजर पर ऑबजरवर की कड़ी निगाह होती है और जिला निर्वाचन अधिकारी यानी जिला कलेक्टर की सांसे उसकी हर निगाह पर अटकी होती है। विधान सभा में हर विधान सभा के लिए अलग अलग ऑबजरवर होते है इसके साथ ही एक ऑबजरवर जो कि आईआरएस अधिकारी होते है वे उम्मीदवार के द्वारा किये जा रहे खर्च पर नजर रखते है। कई विडियोग्राफर एसएसटी व अन्य अधिकारियों के साथ तैनात होते है जो प्रतिदिन उम्मीदवार द्वारा की जाने वाली रैली, स्टार प्रचारको के भाषण, रैली में आने वाली गाड़ियो आदि कि रोज रिकार्डिंग करते है। उम्मीदवारो द्वारा समय समय पर चुनाव खर्च का विवरण दिया जाता है एवं एक्सपेन्डिचर ऑबजरवर इसका मिलान उक्त विडियो रिकार्डिंग, समाचार पत्रो की कटिंग व इस कार्य में ड्यूटी दे रहे अधिकरियों की जानकारी से मिलान कर के अप्रूव करते है या फिर उसका अपने स्तर से निर्धारण करते है।
चुनाव की घोषणा होने के पहले ही जिले में मौजूद ईवीएम की कलेक्टर कार्यालय में ईवीएम हेतु बने स्ट्राँग रुम चेकिंग शुरु हो जाती है जो विज्ञान के प्रोफेसर, इंजिनियर ऐसे अधिकारियों को ईवीएम चेकिंग की लिए ड्यूटी पर लगाया जाता है जो लगभग एक सप्ताह में सारी ईवीएम चेक करके जो ईवीएम बराबर चल रही उसकी रिपोर्ट कलेक्टक को देते है एक एडीएम स्तर के अधिकारी हमेशा इस कार्य की निगरानी करते है। अगर जिले की आवश्यकता से ईवीएम कम है तो रिक्विजिशन भेज कर समय से पहले ही आपूर्ति की जाती है । इसके बाद चुनाव घोषणा होने पर फिर एक बार सारी ईवीएम चेक करते है उसकी बेटरी वगैहर रिप्लेस करते है और मॉक पोल करके चेक की जा ती है। यह प्रक्रिया ऑबजरवर की निगरानी में की जाती है वे कई बार स्ट्रांग रुम में आते है और रेंडम मशीन खुदके सामने चेक करते है।

                                   

         
                                    


हर ईवीएम का एक स्पेसिफिक नम्बर होता है जैसा सब जानते है दो यूनिट होती है एक जिससे मत डाला जाता है और एक कंट्रोल यूनिट जिससे मत रिलिज किया जाता है दोनो मशीने स्पेशल केस में रखी जाती दोनो पर एक ही स्पेसिफिक नंबर होता है जोकि मशीन की पहचान होती है। आजकल इसमे वीवीपेट भी जुड़ गयी है और अब कुल तीन यूनिट होती है। ये सारी ईवीएम चुनाव में मतदान सामग्री वितरण केन्द्र पर बने स्पेशल स्ट्रांग रुम जिसकी सभी खिड़कियाँ रोशनदान व दरवाजे ईंट सीमेंट से चिनवा दिये जाते है सिर्फ एक दरवाजा छोड़कर जिस पर जो लाक लगाया जाता है।

                                      


उस पर जिला निर्वाचन अधिकारी और जितने उम्मीदवार होते है उन सब पार्टियों के उनके अध्यक्ष द्वारा नामांकित प्रतिनिधियों के दस्तख्त से सील लगायी जाती है जो उस दरवाजे पर चस्पा की जाती है। जिला अधिकारी द्वारा जिले के सभी अधिकारियों और कर्मचारियों की सूची चुनाव में ड्यूटी लगायी जाने के लिए हर विभाग से मांगी जाती है। हमेशा जिले की एक तहसील में कार्यरत अधिकारियों की ड्यूटी दूसरी तहसील में लगायी जाती है। जिला निर्वाचन अधिकारी, सभी ऑबजरवर एवं अन्य सभी उच्चाधिकारियों की निगरानी में और सभी उम्मीदवार या उनके प्रतिनिधीयों के समक्ष एक स्पेशल सॉफ्टवेयर से चुनाव अधिकारियो की पोलिंग पार्टियां बनायी जाती है यह बिल्कुल रेंडम होता है और किस अधिकारी के साथ कौन सा दूसरा कर्मचारी या अधिकारी जायेगें यह कम्यूटर सॉफ्टवेयर से होता है। इसके बाद कौन सी पार्टी किस बूथ पर जायेगी यह भी चुनाव आयोग द्वारा निर्मित रेंडम सॉफ्टवेयर की मदद से सबके समक्ष किया जाता है। इस सबके बाद सभी अधिकारियों को सामग्री वितरण केन्द्र पर उनके पोलिंग बूथ पर जाने से संबन्धित आदेश व चुनाव कार्य की सारी सामग्री जिसमें मुख्यतः आपकी ईवीेएम व वीवीपेट मशीन स्ट्रांगरुम से निकाली जा कर वितरित की जाती है। कौन सी मशीन किस पार्टी को दी जाना है किस बूथ पर जायेगी यह भी रेंडम सॉफ्टवेयर से पहले ही तय किया होता है।
अब सवाल उठता है कि इतनी चेकिंग के बाद भी ईवीएम मशीन की शिकायत की काम नही कर रही क्यो आती है। आपने देखा होगा कि ज्यादातर ईवीएम मशीने सुबह ही चालू नही हो पाती एवं इस कारण से बूथ पर वोटिंग देर से शुरु होती है। इसका 75-80 प्रतिशत कारण यह है कि जो प्रिसाईडिंग ऑफिसर है उसने ट्रेनिंग के समय ठीक से मॉक पोल करना व मशीन को सील करना नही सीखा। ज्यादातर पोलिंग पार्टी के दूसरे सदस्य जो पहले चुनाव करा चुके है एवं ईवीएम मशीन को पार्टी प्रतिनिधियों के सामने ठीक से सील कर देते है, लेकिन जब पोलिंग पार्टी पूरी नयी होती है उसमें यह समस्या हमेशा आती है मैंने जोनल ऑफिसर के रुप में कई बार इस समस्या का सामना किया है अक्सर जब मैं अपने क्षेत्र में एक दिन पहले ही जान लेता था कि मेरी सभी पोलिंग पार्टियां अपने काम में दक्ष है या नही और जो कमजोर होते थे मैं सबसे पहले उनके पोलिंग बूथ पर पहुँच कर मॉक पोल करवाने और मशीन सील करने मे उनकी मदद कर देता था। ज्यादातर अधिकारी चुनाव ड्यूटी से डरते है और घबराहट में भी सही काम नही कर पाते।

चुनाव के बाद सभी पोलिंग पार्टी के सदस्य निर्धारित बस जो उनको पोलिंग बूथ पर छोड़कर आती है उसी से वापिस आते है बस में उस रुट के लगभग 10-12 पोलिंग पार्टियां होती है जो एक साथ सामग्री कलेक्शन सेंटर पर आती है। चुनाव पर प्रिसाईडिंग ऑफिसर व पोलिंग पार्टी व पूरी चुनाव प्रक्रिया पर नजर रखने के लिए माइक्रो ऑबजरवर की ड्यूटी भी लगायी जाती है जो कि सेंट्रल गवरमेंट के अधिकारी होते है। वे दिन भर पोलिंग बूथ पर बैठते है और सारी चुनाव की प्रक्रिया पर नजर रखते है वे अपनी रिपोर्ट एक निर्धारित फार्म में सीधे ऑबजरवर को देते है।


जब सामग्री और ईवीएम मशीन जमा की जाती है तो देखा जाता है कि ईवीएम मशीन पर सील वगैरह ठीक से लगी है या नही। सील के टूटे पाये जाने पर उस बूथ पर फिर से चुनाव करवाने की सिफारिश ऑबजरवर द्वारा चुनाव आयोग को उसकी रिपोर्ट में की जाती है। ईवीएम मशीन ले जाने के लिए सामग्री संकलन केन्द्र से स्ट्रांगरुम तक एक विशेष कॉरिडोर बनाया जाता है जिससे कर्मचारी ईवीएम मशीन को सीधे ले जाकर स्ट्रांग रुम में रखते है। जब सारी ईवीएम मशीन जिले के सारे पोलिंग बूथ की जमा हो जाती है तो जिला निर्वाचन अधिकारी एवं लगभग सभी अन्य अधिकारियों सारे पोलिटिकल पार्टियों के प्रतिनिधियों एवं सेंट्रल ऑबजरवर के सामने स्ट्रांग रुम लॉक करके सील कर दिया जाता है। स्ट्रांग रुम के चारो तरफ थ्री टियर सिक्यूरिटी होती है जिसमें पेरा मिलिटरी एवं लोकल पुलिस दोनो शामिल होती। सिक्यूरिटी न सिर्फ स्ट्राग रुम के दरवाजे के बाहर बल्कि उस बरामदे एवं बिल्डिंग जहाँ स्ट्रांग रुम है उसके बाहर भी होती हे।




इसके बाद जिस दिन काउंटिंग होना है उसी दिन सबकी मौजूदगी में स्ट्रांग रुम के दरवाजे खुलते है। सभी पोलिटकल पार्टियोे के प्रतिनिधी तसल्ली करते है कि उनके दस्तख्त वाली सील ठीक है या नही उसके बाद दरवाजा खोला जाकर हर तहसील के काउंटिंग रुम में उस तहसील की ईवीम पहुँचायी जाती है। जितनी टेबल काउंटिंग रुम में होती है एक बार में उतनी ही ईवीएम मशीन पहूँचायी जाती है। काउंटिंग रुम में कम से कम दो तरफ जाली लगा कर पोलिटिकल पार्टियों के प्रतिनिधियों द्वारा काउंटिग कार्य देखने के लिए व्यवस्था की जाती है उक्त कक्ष में पोलिटकल पार्टी के अध्यक्ष जिनको काउंटिंग में उपस्थित रहने का पत्र पहले से जारी करते है वे उस जाली के बाहर से सारी काउंटिंग की प्रक्रिया देखते है।




हर राउंड की काउंटिंग के बाद कक्ष में मौजूद नियंत्रण अधिकारी बोर्ड पर मतो की गणना लिखते है व चार्ट में एंट्री करते है। जिला निर्वाचन अधिकारी , ऑबजरवर सभी पूरे समय मौजूद रहते है एवं जीतने वाले उम्मीदवार को उसी समय प्रमाणपत्र जारी करते है।


चुनाव आयोग द्वारा विस्त़त नियम बनाये गये है जिनका अनुसरण कड़ाई से किया जाता है। हर प्रक्रिया पारर्दशी है एवं हर महत्वपूर्ण स्टेप पर या तो उम्मीदवार खुद या उनके प्रतिनिधी न सिर्फ मौजूद रहते है बल्कि हर स्तर पर उनके दस्तख्त भी लिये जाते है। इसके उपरांत भी अगर राजनितिक पार्टियां ईवीएम में गड़बड़ी की आंशका जताती है तो वे सिर्फ आपका ( वोटर ) का अपमान कर रही है।
मुझे गर्व है कि अपनी शासकीय सेवा में अनेक बार भारत के सबसे ज्यादा पारर्दशी, कठोर नियमो से युक्त प्रोफशनल चुनाव आयोग के तहत काम करने का मौका मिला। चुनाव कार्य में चुनाव आयुक्त से लेकर सबसे छोटा कर्मचारी निर्धारित टाईम लाईन में कुशलता से अपना सर्वोच्च देकर लोकतंत्र के पावन यज्ञ में अपनी आहुति देता है। राजनितिक दलो को यह याद रखना चाहिये चुनाव आयोग व उसकी प्रक्रिया पर अविश्वास यह उन सभी अधिकारियों और कर्मचारियों का भी अपमान है।