मंगलवार, 6 अगस्त 2024

क्या भारत में तख्ता पलट हो सकता है?


बांग्लादेश देश की इकॉनॉमी पाकिस्तान श्रीलंका और कई देशों से अच्छी थी। फिर वहाँ क्यों आरक्षण पर इतना विवाद और प्रोटेस्ट हुआ कि श्रीलंका की तरह पब्लिक सड़कों पर उतर आयी संसद व प्रधानमंत्री आवास तक चली गयी। 

जिस तरह से लोग कुर्सियाँ पंखे सोफे लूट लूट कर ले जा रहे थे उसने मुझे ३१ अक्टूबर १९८४ में इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद इंदौर में पब्लिक को सरदार घरों में से सामान लूट कर ले जाते देखा था। उनकी लड़कियाँ महिलाएँ ऐसे ही घर के दरवाज़ों में सोफे व सामान लगा लगा कर चिल्ला रही थी लोग जलते टायर उनके घरो में फेंक रहे थे। यह राजनैतिक अराजकता है जब पुलिस और सेना भी दंगाइयों के साथ खड़ी नही भी होती हैं तो कुछ करती भी नहीं। 


आखिर छोटी मोटी घटनाओं के बाद अचानक ऐसा बवाल क्यों मचता है ये कौन लोग हैं जो अचानक सड़कों पर उतर आते है और देखते ही देखते तख्ता पलट कर देते है। याद करें एक अमेरिकी पुलिस वाले ने एक अफ्रीकी मूल के व्यक्ति को अरेस्ट किया था उसके हाथापाई करने पर उसे गिरा कर बूट उसके मुँह पर रखा और यह विडियो फोटो “ Blake live’s matters “ करके इतना प्रचारित हुआ कि ट्रम्प चुनाव जीतते जीतते हार गये।


इंदिरा गाँधी हमेशा सेना द्वारा तख़्ता पलट को लेकर सशंकित रहती थीं। इंदिरा गांधी विश्वस्त व्यक्तियों को प्राथमिकता से हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठता को नज़रअंदाज़ करके चीफ़ जस्टिस नियुक्त करती थी। सेना के प्रमुख पदो पर भी नियुक्तियों में वरिष्ठता के बजाय विश्वसनीय लोगो पर ध्यान होता था। यहाँ तक भी उनके कार्यकाल में राष्ट्रपति भी उनके विश्वस्त व्यक्ति ही थे। हालाँकि उनके राजेंद्र धवन जैसे सलाहकार हमेशा कहते थे कि भारत एक विशाल देश है और इसमें तख्ता पलट संभव नहीं है। सेना के तीन विभाग है और वे अलग-अलग है और भी अलग-अलग परिस्थितियाँ है। शायद इसलिए ही चीफ़ ऑफ आर्मी स्टॉफ की पोस्ट भी हमेशा खाली रही। उन्होंने सिर्फ़ एक गलती की वो यह की ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार के बाद सिक्योरिटी वार्निंग के बाद भी निजी सुरक्षा गॉर्डो की वेटिंग नही की।


मुझे लगता है कि यह मिथ ही है कि आज भारत में तख्ता पलट नहीं हो सकता है। नरेंद्र मोदी उसी राह पर चल रहे है जिस पर हसीना शेख चली। यह फील गुड फेक्टर और बार बार भ्रष्टाचार को मिटाने के वादे करना लेकिन धरातल पर वे एक भी बड़े राजनीतिक भ्रष्टाचारी पर निर्णायक बिन्दु तक केस नहीं पहुँचा सके। ज्यूडीशरी पर नरेंद्र मोदी का कोई नियंत्रण नहीं है। यह कैसा न्याय तंत्र है की चीफ जस्टिस की चलती अदालत के बीच मनु संघवी पवन खेड़ा की बेल अप्लाय करते है और १० मिनट में जमानत मिल जाती हैं । तीस्ता सितलवाड की बेल हाईकोर्ट कैंसिल करता है छुट्टी के दिन शाम ७ बजे बीच भरतनाट्यम डांस प्रोग्राम से उठ कर चीफ़ जस्टिस आते है व जमानत दे कर फिर नाच देखने चले जाते है। वहीं दूसरी और बिहार का मनीष बार बार सुप्रीम कोर्ट जाता है उसे वह सुनने के लिए ही तैयार नही उसको १० महीने बाद जमानत मिलती हैं।


प्रधानमंत्री भी देश के एडमिनिस्ट्रेटर है वे कोई सवाल नही करते चीफ़ जस्टिस से? पब्लिक फोरम पर तो ऐसी विसंगति के बारे में बोल सकते है? दिल्ली के शीशमहल शराब घोटाले वाड्रा के डीएलएफ के जमीन घोटाले नेशनल हेरल्ड के व राहुल की ब्रिटेन की नागरिकता आदि ऐसे विषय है जिनमें डॉक्यूमेंटरी एविडेंस है लेकिन सालो से ये ही लोग दबा कर बैठे हैं । अब नरेन्द्र मोदी को लगता है की जीवन में जो कुछ अचिव करना था उससे ज़्यादा मिल गया है। अब बस नोबेल पीस प्राइज़ और मिल जाये बहुत है। 


लेकिन वर्तमान हालात और देश में राहुल गांधी की बढ़ती लोकप्रियता ख़ासतौर पर लगभग सभी वर्ग के लोग व जातियों का साथ देख कर ऐसा लगता है नरेंद्र मोदी के हाथ से सत्ता फिसलती जा रही है।

Team Modi अब उनके ख़िलाफ़ चलाये जा रहे नरेटिव का जवाब नहीं दे पा रहे। आई टी सेल निष्क्रिय है ज्यूडीशरी पर नियंत्रण नही है और यह लापरवाही एक अच्छी सरकार को ले डूबेगी।

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नोटः- यह विशुद्ध मेरे विचार से वर्तमान हालात पर विश्लेषणात्मक टिप्पणी है इसका किसी पार्टी पोलिटिक्स से लेना देना नहीं है।



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