शुक्रवार, 8 नवंबर 2024

ट्रम्प की जीत के मायने!


सारी दुनिया की निगाहें इस बार अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव पर लगी हुई थी। सबके अपने अपने निजी कारण थे।

1. सबसे पहले यूक्रेन व रशिया के बीच कभी न ख़त्म होने वाले युद्ध सिर्फ़ अमेरिका के सपोर्ट के कारण दो साल से चल रहा था। 

2. दरअसल अमेरिका की इकॉनॉमी का 70% हथियारों से आता है यहाँ फाइटर जेट से लेकर मशीनगन तोपें मिसाइल असाल्ट रायफ़ल्स पिस्टल हेलमेट जिनमें अंधेरे में देख सकने से लेकर सारे सेंसर लगे होते है गरज यह कि हर कुछ वहाँ से खरीदा जा सकता है । 

3. यह हथियार निर्माता चाहते है कि दुनिया में युद्ध चलते रहे और इसलिए उनकी एक बड़ी लॉबी ऐसा राष्ट्रपति चाहते है जो आग में घी डालता रहे।


4. 1960 से शीत युद्ध के दौरान प्रो वेस्ट साउथ विएतनाम को सैन्य मदद करता रहा। लाखो अमेरिकी सैनिक हर साल वहाँ जा रहे थे हर किस्म के हथियार भी कार्गो हवाई जहाज ले जा रहे थे पहली बार वहाँ नेपाम बम उपयोग में लाये गये जिससे सिर्फ़
आग लग जाती थी। उत्तरी विएतनाम ने हो चि मिन्ह के नेतृत्व में अंततः 1975 में दक्षिण विएतनाम को मिलाकर एकीकरण कर दिया यह अमेरिका की बहुत बड़ी हार थी। 



5. यह अफ़ग़ानिस्तान में दोहराया गया पहले अफ़ग़ानिस्तान को मदद की गयी रशिया के खिलाफ रशिया के वहाँ से हटने के बाद तालिबान स्थापित हुए फिर 9/11 हुआ और अमरीकी सैनिक अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के खिलाफ उतरे अंततः हार कर वापिस आ गये

6. अब यूक्रेन रशिया युद्ध तो चल ही रहा है इज़राइल हमास हिज़्बुल्लाह इराक़ लेबनान सब बेतहाशा फुल स्केल वार में शामिल है।



7. अमेरिकी हथियार निर्माताओं की पो बारह है और इसलिए ही ट्रम्प के पिछले चुनाव में उनको हराने व कठपुतली राष्ट्रपति बनाने के लिए बाइडेन को जीताने मे सारी ताकत लगा दी थी व सफल भी हुऐ थे।

8. ट्रम्प एक व्यापारी है लेकिन इसके बावजूद अमेरिका को लेकर उनकी पॉलिसी स्पष्ट है। वे शरणार्थियों व विदेशियों के लेकर उदारवादी नही है। अमेरिका का पूरी दुनिया में अलग-अलग जगहो पर युद्ध में शामिल होना और अमेरिकी सैनिकों का उसमें अकारण जान गँवाना भी उन्हें पंसद नही है।


9. इस बार उन्होंने गलती नही की और चुनाव में अपने ख़िलाफ़ नेगेटिव नेरेटिव सेट नही होने दिया जो कि हथियार लॉबी की मदद से वामपंथी विचारधारा के लोग करते हैं बिलकुल भारत की तरह की संविधान खतरे में है, देश बेच देंगे, सेक्युलरिज्म को ख़त्म कर देंगे राजदीप सरदेसाई के अनुसार इस्लामोफोबिया कर देंगे।



10. अब यूक्रेन को मिलने वाली मदद कम हो जायेगी और यूक्रेन को रशिया से जल्द समझौता करना होगा।

11. नाटो देश शांत हो कर राहत की सांस लेंगे क्योंकि उनके उपर मंडरा रही युद्ध की विभीषिका ख़त्म हो जायेगी । सुरक्षा के नाम पर उनको बेचे जा रहे हथियारों की ख़रीद की अब उनको जरुरत नही रहेगी। वे आर्थिक तरक़्क़ी की तरफ बढ़ेंगे।

12. ट्रम्प व मोदी में एक समानता है कि वे वामपंथी विचारधारा या अगर कुछ प्रबुद्ध लोग जो डीप स्टेट के बारे में समझते है उसके इशारों पर चलने वाले लोग नही है।

13. मोदी ने अपने पहले दो कार्यकाल में वादे तो बहुत किये परंतु निभा नही पाये। धारा 370 हटाने व ट्रिपल तलाक़ क़ानून के अलावा वे एक भी भ्रष्टाचारी को सजा नही दिलवा पाए। लालू यादव जैसे सजायाफ्ता लोग जमानत पर फ़ाइव स्टार ज़िंदगी जी रहे है अरविंद केजरीवाल की टीम जेल में मसाज करवा रहे है होटल से खाना खा रहे है कुछ नही हुआ। हेमंत सोरेन भी बाहर घूम रहे है। अजित पंवार से समझौता बहुत मँहगा पड़ा इस लोकसभा चुनाव में और चंद्रा बाबू नायडू को क्लीन चिट मिल ही गयी है इसके अलावा कई भ्रष्टाचार के आरोप वाले नेताओ को पार्टी में बग़ैर उनकी रणनीतिक योग्यता के लेना भारी पड़ गया। दलित व मुस्लिम वोट भाजपा से पूरी तरह छिटक गया है और सबका साथ सबका विकास लेकिन बहुत से अपर कास्ट, दलित मुस्लिम का विश्वास नही के कारण 244 पर सिमट लिए।




14. इसके अलावा नरेंद्र मोदी और उनकी टीम अपने ख़िलाफ़ नेगेटिव नेरेटिव की काट करने में विफल रही। सोशल मिडिया आई टी सेल ना तो आक्रामक रहे ना ही डिफेंड कर पाए।

15.इसमें कोई संदेह नही की ट्रम्प की जीत में इस बार सबसे बड़ा योगदान अमेरिकी हिंदू वोट का रहा जो पिछली बार से 9% ज़्यादा मिले। 

16. ट्रम्प की जीत के मायने यह है कि हँलाकि 2029 का चुनाव नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में नहीं लड़ा जाएगा लेकिन भाजपा की जीत काफी हद तक निश्चित है। इस अमेरिकी चुनाव में हिंदू वोटों की एकजुटता से भारत के हिंदू वोट भी एक जुट होने जा रहे है। 

17. इसका ट्रायल अब महाराष्ट्र, झारखंड व यूपी के उप चुनाव में देखने को मिल सकता है। 



मंगलवार, 6 अगस्त 2024

क्या भारत में तख्ता पलट हो सकता है?


बांग्लादेश देश की इकॉनॉमी पाकिस्तान श्रीलंका और कई देशों से अच्छी थी। फिर वहाँ क्यों आरक्षण पर इतना विवाद और प्रोटेस्ट हुआ कि श्रीलंका की तरह पब्लिक सड़कों पर उतर आयी संसद व प्रधानमंत्री आवास तक चली गयी। 

जिस तरह से लोग कुर्सियाँ पंखे सोफे लूट लूट कर ले जा रहे थे उसने मुझे ३१ अक्टूबर १९८४ में इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद इंदौर में पब्लिक को सरदार घरों में से सामान लूट कर ले जाते देखा था। उनकी लड़कियाँ महिलाएँ ऐसे ही घर के दरवाज़ों में सोफे व सामान लगा लगा कर चिल्ला रही थी लोग जलते टायर उनके घरो में फेंक रहे थे। यह राजनैतिक अराजकता है जब पुलिस और सेना भी दंगाइयों के साथ खड़ी नही भी होती हैं तो कुछ करती भी नहीं। 


आखिर छोटी मोटी घटनाओं के बाद अचानक ऐसा बवाल क्यों मचता है ये कौन लोग हैं जो अचानक सड़कों पर उतर आते है और देखते ही देखते तख्ता पलट कर देते है। याद करें एक अमेरिकी पुलिस वाले ने एक अफ्रीकी मूल के व्यक्ति को अरेस्ट किया था उसके हाथापाई करने पर उसे गिरा कर बूट उसके मुँह पर रखा और यह विडियो फोटो “ Blake live’s matters “ करके इतना प्रचारित हुआ कि ट्रम्प चुनाव जीतते जीतते हार गये।


इंदिरा गाँधी हमेशा सेना द्वारा तख़्ता पलट को लेकर सशंकित रहती थीं। इंदिरा गांधी विश्वस्त व्यक्तियों को प्राथमिकता से हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठता को नज़रअंदाज़ करके चीफ़ जस्टिस नियुक्त करती थी। सेना के प्रमुख पदो पर भी नियुक्तियों में वरिष्ठता के बजाय विश्वसनीय लोगो पर ध्यान होता था। यहाँ तक भी उनके कार्यकाल में राष्ट्रपति भी उनके विश्वस्त व्यक्ति ही थे। हालाँकि उनके राजेंद्र धवन जैसे सलाहकार हमेशा कहते थे कि भारत एक विशाल देश है और इसमें तख्ता पलट संभव नहीं है। सेना के तीन विभाग है और वे अलग-अलग है और भी अलग-अलग परिस्थितियाँ है। शायद इसलिए ही चीफ़ ऑफ आर्मी स्टॉफ की पोस्ट भी हमेशा खाली रही। उन्होंने सिर्फ़ एक गलती की वो यह की ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार के बाद सिक्योरिटी वार्निंग के बाद भी निजी सुरक्षा गॉर्डो की वेटिंग नही की।


मुझे लगता है कि यह मिथ ही है कि आज भारत में तख्ता पलट नहीं हो सकता है। नरेंद्र मोदी उसी राह पर चल रहे है जिस पर हसीना शेख चली। यह फील गुड फेक्टर और बार बार भ्रष्टाचार को मिटाने के वादे करना लेकिन धरातल पर वे एक भी बड़े राजनीतिक भ्रष्टाचारी पर निर्णायक बिन्दु तक केस नहीं पहुँचा सके। ज्यूडीशरी पर नरेंद्र मोदी का कोई नियंत्रण नहीं है। यह कैसा न्याय तंत्र है की चीफ जस्टिस की चलती अदालत के बीच मनु संघवी पवन खेड़ा की बेल अप्लाय करते है और १० मिनट में जमानत मिल जाती हैं । तीस्ता सितलवाड की बेल हाईकोर्ट कैंसिल करता है छुट्टी के दिन शाम ७ बजे बीच भरतनाट्यम डांस प्रोग्राम से उठ कर चीफ़ जस्टिस आते है व जमानत दे कर फिर नाच देखने चले जाते है। वहीं दूसरी और बिहार का मनीष बार बार सुप्रीम कोर्ट जाता है उसे वह सुनने के लिए ही तैयार नही उसको १० महीने बाद जमानत मिलती हैं।


प्रधानमंत्री भी देश के एडमिनिस्ट्रेटर है वे कोई सवाल नही करते चीफ़ जस्टिस से? पब्लिक फोरम पर तो ऐसी विसंगति के बारे में बोल सकते है? दिल्ली के शीशमहल शराब घोटाले वाड्रा के डीएलएफ के जमीन घोटाले नेशनल हेरल्ड के व राहुल की ब्रिटेन की नागरिकता आदि ऐसे विषय है जिनमें डॉक्यूमेंटरी एविडेंस है लेकिन सालो से ये ही लोग दबा कर बैठे हैं । अब नरेन्द्र मोदी को लगता है की जीवन में जो कुछ अचिव करना था उससे ज़्यादा मिल गया है। अब बस नोबेल पीस प्राइज़ और मिल जाये बहुत है। 


लेकिन वर्तमान हालात और देश में राहुल गांधी की बढ़ती लोकप्रियता ख़ासतौर पर लगभग सभी वर्ग के लोग व जातियों का साथ देख कर ऐसा लगता है नरेंद्र मोदी के हाथ से सत्ता फिसलती जा रही है।

Team Modi अब उनके ख़िलाफ़ चलाये जा रहे नरेटिव का जवाब नहीं दे पा रहे। आई टी सेल निष्क्रिय है ज्यूडीशरी पर नियंत्रण नही है और यह लापरवाही एक अच्छी सरकार को ले डूबेगी।

#narendramodi_primeminister

#NarendraModi

#AmitShah

#RahulGandhi

नोटः- यह विशुद्ध मेरे विचार से वर्तमान हालात पर विश्लेषणात्मक टिप्पणी है इसका किसी पार्टी पोलिटिक्स से लेना देना नहीं है।



गुरुवार, 7 सितंबर 2023

नरेन्द्र मोदी क्वीन्स गेम्बिट d4

 कुछ दिनो से वन नेशन वन इलेक्शन भारत बनाम इंडिया सनातन का शोर सोशल मीडिया पर छिड़ा है।

दरअसल न तो राजनीतिक दल न आम सोशल मीडिया के बुद्धिजीवी यह समझ पा रहे है कि यह २०२४ के चुनाव की राजनीतिक बिसात पर नरेन्द्र मोदी ने क्वीन्स गेम्बिट खेलते हुए अपना पहला प्यादा d4 आगे बढ़ा दिया है।

अगर आप गौर से आकलन करे तो मोदी ने अलायंस के मुम्बई में मज़बूत होते विपक्ष के धर्रे धर्रे उड़ा दिये। सबसे पहले उन्होंने बीच मीटिंग के विशेष संसद सत्र बुलाने की घोषणा की मुम्बई मीटिंग को छोड़कर सारे चैनल इसी में व्यस्त रहे शाम होते होते आजतक ने स्कूप निकाल लिया और अंजना ओम कश्यप ने हल्ला बोल वन नेशन वन इलेक्शन से शुरु किया ज़ाहिर है लीक पीएमओ से आया होगा कि यह वन नेशन वन इलेक्शन के बारे में है। दो दिन  तक टीवी पर बहस चलती रही मुम्बई में अलायंस की मीटिंग को कोई कवरेज नही मिला।

अभी उससे आप निकले भी नही थे की G20 Bharat के सिर्फ़ एक आमंत्रण कार्ड पर प्रेसिडेंट ऑफ भारत लिखा देखकर जयराम रमेश ने उड़ता तीर लपक लिया । कांग्रेस ने जब अपने अलायंस का नाम INDIA रखा तो मोदी क्या मूर्ख है जो उसका प्रचार करेंगे । आप को सही मे कुछ नही बोलना था परंतु पहले जयराम रमेश फिर पूरा विपक्ष कूद गया। दो दिन से सारे टीवी चैनल डिबेट करते घूम रहे है।



देश  में सर्वे हो रहा है हर हिंदुस्तानी बोल रहा है भारत नाम सही है। इसका मतलब समझ रहे है आप देश के सामने कांग्रेसी जब भारत नाम का विरोध करते है तो कांग्रेस की भारत विरोधी छवि बनती हैं ।। अभी तक आप जाति गत  वोट जो ज़्यादातर एक ही जगह वोट करते है उनके हितो की बात करके चुनाव जीतते आए है। फिर हिंदू भी अनेक जातियों में बँटे है इसलिए जातिवाद के आधार पर प्रत्याशी के अनुसार भी वोट बँट जाते है।  रही सही कसर उदयनिधी ने पूरी कर दी। उन्होंने जो बोला सो बोला प्रियांक खरगे को बोलने की क्या जरुरत थी सब बग़ैर सोचे समझे कूद गये। 





आप लोगो नही समझे कि देश में ८० करोड़ सनातनी है यह वोटर अगर आपसे नाराज हो कर एक जगह इकट्ठा हो गया तो अगले १०० साल आप जीत नही सकते। दरअसल सारा विपक्ष मोदी की ताल पर नाच रहा है वे मोदी की आलोचना करते है गाली बकते है लेकिन वे राजनीति की बिसात पर क्या चाल चलेंगे आप नही समझते है। 

अभी तो विशेष संसद सत्र आगे है।

०इब्तिदा-ए-इश्क़ है रोता है क्या, आगे-आगे देखिए होता है क्या”

बुधवार, 22 मई 2019

भारत में चुनाव प्रक्रिया और ईवीएम का सच

अब चुनाव सम्पन्न हो गये है एक्सिट पोल भी आ रहे है लेकिन एक जो बात खासतौर से विपक्ष करने में लगा हुआ है वो यह कि ईवीएम में गड़बड़ की जा सकती है या फिर ईवीएम हेक हो सकती है इससे चुनाव परिणाम प्रभावित हो सकते है। वैसे जो भी हार रहा है वो अपनी हार स्वीकार करने के बजाय उस हार का ठीकरा कहीँ और फोड़ना चाहता है लेकिन फिर भी दुष्प्रचार से कभी कभी सामान्य जन जो चुनाव प्रक्रिया से वाकिफ नही है सोचने लगते है कि हो सकता है ईवीएम में हेराफेरी की गयी हो वरना कोई पार्टी आज के जमाने में 350-400 सीट से कैसे जीत सकती है।
मै यह बताना चाहता हूँ कि मेरे शासकीय सेवा काल में मैने लगभग सभी लोकसभा व विधान सभा चुनाव में अनेक पदो पर सक्रियता से कार्य किया है खासतौर से प्रोटोकॉल ऑफिसर के पद पर लोकसभा व विधान सभा दोनो ही चुनाव में बाहर से आये आईएएस ऑबजरवर के साथ काम करना बड़ा चुनौती पूर्ण है। दरअसल जिले में होने वाले सम्पूर्ण चुनाव के प्रोसिजर पर ऑबजरवर की कड़ी निगाह होती है और जिला निर्वाचन अधिकारी यानी जिला कलेक्टर की सांसे उसकी हर निगाह पर अटकी होती है। विधान सभा में हर विधान सभा के लिए अलग अलग ऑबजरवर होते है इसके साथ ही एक ऑबजरवर जो कि आईआरएस अधिकारी होते है वे उम्मीदवार के द्वारा किये जा रहे खर्च पर नजर रखते है। कई विडियोग्राफर एसएसटी व अन्य अधिकारियों के साथ तैनात होते है जो प्रतिदिन उम्मीदवार द्वारा की जाने वाली रैली, स्टार प्रचारको के भाषण, रैली में आने वाली गाड़ियो आदि कि रोज रिकार्डिंग करते है। उम्मीदवारो द्वारा समय समय पर चुनाव खर्च का विवरण दिया जाता है एवं एक्सपेन्डिचर ऑबजरवर इसका मिलान उक्त विडियो रिकार्डिंग, समाचार पत्रो की कटिंग व इस कार्य में ड्यूटी दे रहे अधिकरियों की जानकारी से मिलान कर के अप्रूव करते है या फिर उसका अपने स्तर से निर्धारण करते है।
चुनाव की घोषणा होने के पहले ही जिले में मौजूद ईवीएम की कलेक्टर कार्यालय में ईवीएम हेतु बने स्ट्राँग रुम चेकिंग शुरु हो जाती है जो विज्ञान के प्रोफेसर, इंजिनियर ऐसे अधिकारियों को ईवीएम चेकिंग की लिए ड्यूटी पर लगाया जाता है जो लगभग एक सप्ताह में सारी ईवीएम चेक करके जो ईवीएम बराबर चल रही उसकी रिपोर्ट कलेक्टक को देते है एक एडीएम स्तर के अधिकारी हमेशा इस कार्य की निगरानी करते है। अगर जिले की आवश्यकता से ईवीएम कम है तो रिक्विजिशन भेज कर समय से पहले ही आपूर्ति की जाती है । इसके बाद चुनाव घोषणा होने पर फिर एक बार सारी ईवीएम चेक करते है उसकी बेटरी वगैहर रिप्लेस करते है और मॉक पोल करके चेक की जा ती है। यह प्रक्रिया ऑबजरवर की निगरानी में की जाती है वे कई बार स्ट्रांग रुम में आते है और रेंडम मशीन खुदके सामने चेक करते है।

                                   

         
                                    


हर ईवीएम का एक स्पेसिफिक नम्बर होता है जैसा सब जानते है दो यूनिट होती है एक जिससे मत डाला जाता है और एक कंट्रोल यूनिट जिससे मत रिलिज किया जाता है दोनो मशीने स्पेशल केस में रखी जाती दोनो पर एक ही स्पेसिफिक नंबर होता है जोकि मशीन की पहचान होती है। आजकल इसमे वीवीपेट भी जुड़ गयी है और अब कुल तीन यूनिट होती है। ये सारी ईवीएम चुनाव में मतदान सामग्री वितरण केन्द्र पर बने स्पेशल स्ट्रांग रुम जिसकी सभी खिड़कियाँ रोशनदान व दरवाजे ईंट सीमेंट से चिनवा दिये जाते है सिर्फ एक दरवाजा छोड़कर जिस पर जो लाक लगाया जाता है।

                                      


उस पर जिला निर्वाचन अधिकारी और जितने उम्मीदवार होते है उन सब पार्टियों के उनके अध्यक्ष द्वारा नामांकित प्रतिनिधियों के दस्तख्त से सील लगायी जाती है जो उस दरवाजे पर चस्पा की जाती है। जिला अधिकारी द्वारा जिले के सभी अधिकारियों और कर्मचारियों की सूची चुनाव में ड्यूटी लगायी जाने के लिए हर विभाग से मांगी जाती है। हमेशा जिले की एक तहसील में कार्यरत अधिकारियों की ड्यूटी दूसरी तहसील में लगायी जाती है। जिला निर्वाचन अधिकारी, सभी ऑबजरवर एवं अन्य सभी उच्चाधिकारियों की निगरानी में और सभी उम्मीदवार या उनके प्रतिनिधीयों के समक्ष एक स्पेशल सॉफ्टवेयर से चुनाव अधिकारियो की पोलिंग पार्टियां बनायी जाती है यह बिल्कुल रेंडम होता है और किस अधिकारी के साथ कौन सा दूसरा कर्मचारी या अधिकारी जायेगें यह कम्यूटर सॉफ्टवेयर से होता है। इसके बाद कौन सी पार्टी किस बूथ पर जायेगी यह भी चुनाव आयोग द्वारा निर्मित रेंडम सॉफ्टवेयर की मदद से सबके समक्ष किया जाता है। इस सबके बाद सभी अधिकारियों को सामग्री वितरण केन्द्र पर उनके पोलिंग बूथ पर जाने से संबन्धित आदेश व चुनाव कार्य की सारी सामग्री जिसमें मुख्यतः आपकी ईवीेएम व वीवीपेट मशीन स्ट्रांगरुम से निकाली जा कर वितरित की जाती है। कौन सी मशीन किस पार्टी को दी जाना है किस बूथ पर जायेगी यह भी रेंडम सॉफ्टवेयर से पहले ही तय किया होता है।
अब सवाल उठता है कि इतनी चेकिंग के बाद भी ईवीएम मशीन की शिकायत की काम नही कर रही क्यो आती है। आपने देखा होगा कि ज्यादातर ईवीएम मशीने सुबह ही चालू नही हो पाती एवं इस कारण से बूथ पर वोटिंग देर से शुरु होती है। इसका 75-80 प्रतिशत कारण यह है कि जो प्रिसाईडिंग ऑफिसर है उसने ट्रेनिंग के समय ठीक से मॉक पोल करना व मशीन को सील करना नही सीखा। ज्यादातर पोलिंग पार्टी के दूसरे सदस्य जो पहले चुनाव करा चुके है एवं ईवीएम मशीन को पार्टी प्रतिनिधियों के सामने ठीक से सील कर देते है, लेकिन जब पोलिंग पार्टी पूरी नयी होती है उसमें यह समस्या हमेशा आती है मैंने जोनल ऑफिसर के रुप में कई बार इस समस्या का सामना किया है अक्सर जब मैं अपने क्षेत्र में एक दिन पहले ही जान लेता था कि मेरी सभी पोलिंग पार्टियां अपने काम में दक्ष है या नही और जो कमजोर होते थे मैं सबसे पहले उनके पोलिंग बूथ पर पहुँच कर मॉक पोल करवाने और मशीन सील करने मे उनकी मदद कर देता था। ज्यादातर अधिकारी चुनाव ड्यूटी से डरते है और घबराहट में भी सही काम नही कर पाते।

चुनाव के बाद सभी पोलिंग पार्टी के सदस्य निर्धारित बस जो उनको पोलिंग बूथ पर छोड़कर आती है उसी से वापिस आते है बस में उस रुट के लगभग 10-12 पोलिंग पार्टियां होती है जो एक साथ सामग्री कलेक्शन सेंटर पर आती है। चुनाव पर प्रिसाईडिंग ऑफिसर व पोलिंग पार्टी व पूरी चुनाव प्रक्रिया पर नजर रखने के लिए माइक्रो ऑबजरवर की ड्यूटी भी लगायी जाती है जो कि सेंट्रल गवरमेंट के अधिकारी होते है। वे दिन भर पोलिंग बूथ पर बैठते है और सारी चुनाव की प्रक्रिया पर नजर रखते है वे अपनी रिपोर्ट एक निर्धारित फार्म में सीधे ऑबजरवर को देते है।


जब सामग्री और ईवीएम मशीन जमा की जाती है तो देखा जाता है कि ईवीएम मशीन पर सील वगैरह ठीक से लगी है या नही। सील के टूटे पाये जाने पर उस बूथ पर फिर से चुनाव करवाने की सिफारिश ऑबजरवर द्वारा चुनाव आयोग को उसकी रिपोर्ट में की जाती है। ईवीएम मशीन ले जाने के लिए सामग्री संकलन केन्द्र से स्ट्रांगरुम तक एक विशेष कॉरिडोर बनाया जाता है जिससे कर्मचारी ईवीएम मशीन को सीधे ले जाकर स्ट्रांग रुम में रखते है। जब सारी ईवीएम मशीन जिले के सारे पोलिंग बूथ की जमा हो जाती है तो जिला निर्वाचन अधिकारी एवं लगभग सभी अन्य अधिकारियों सारे पोलिटिकल पार्टियों के प्रतिनिधियों एवं सेंट्रल ऑबजरवर के सामने स्ट्रांग रुम लॉक करके सील कर दिया जाता है। स्ट्रांग रुम के चारो तरफ थ्री टियर सिक्यूरिटी होती है जिसमें पेरा मिलिटरी एवं लोकल पुलिस दोनो शामिल होती। सिक्यूरिटी न सिर्फ स्ट्राग रुम के दरवाजे के बाहर बल्कि उस बरामदे एवं बिल्डिंग जहाँ स्ट्रांग रुम है उसके बाहर भी होती हे।




इसके बाद जिस दिन काउंटिंग होना है उसी दिन सबकी मौजूदगी में स्ट्रांग रुम के दरवाजे खुलते है। सभी पोलिटकल पार्टियोे के प्रतिनिधी तसल्ली करते है कि उनके दस्तख्त वाली सील ठीक है या नही उसके बाद दरवाजा खोला जाकर हर तहसील के काउंटिंग रुम में उस तहसील की ईवीम पहुँचायी जाती है। जितनी टेबल काउंटिंग रुम में होती है एक बार में उतनी ही ईवीएम मशीन पहूँचायी जाती है। काउंटिंग रुम में कम से कम दो तरफ जाली लगा कर पोलिटिकल पार्टियों के प्रतिनिधियों द्वारा काउंटिग कार्य देखने के लिए व्यवस्था की जाती है उक्त कक्ष में पोलिटकल पार्टी के अध्यक्ष जिनको काउंटिंग में उपस्थित रहने का पत्र पहले से जारी करते है वे उस जाली के बाहर से सारी काउंटिंग की प्रक्रिया देखते है।




हर राउंड की काउंटिंग के बाद कक्ष में मौजूद नियंत्रण अधिकारी बोर्ड पर मतो की गणना लिखते है व चार्ट में एंट्री करते है। जिला निर्वाचन अधिकारी , ऑबजरवर सभी पूरे समय मौजूद रहते है एवं जीतने वाले उम्मीदवार को उसी समय प्रमाणपत्र जारी करते है।


चुनाव आयोग द्वारा विस्त़त नियम बनाये गये है जिनका अनुसरण कड़ाई से किया जाता है। हर प्रक्रिया पारर्दशी है एवं हर महत्वपूर्ण स्टेप पर या तो उम्मीदवार खुद या उनके प्रतिनिधी न सिर्फ मौजूद रहते है बल्कि हर स्तर पर उनके दस्तख्त भी लिये जाते है। इसके उपरांत भी अगर राजनितिक पार्टियां ईवीएम में गड़बड़ी की आंशका जताती है तो वे सिर्फ आपका ( वोटर ) का अपमान कर रही है।
मुझे गर्व है कि अपनी शासकीय सेवा में अनेक बार भारत के सबसे ज्यादा पारर्दशी, कठोर नियमो से युक्त प्रोफशनल चुनाव आयोग के तहत काम करने का मौका मिला। चुनाव कार्य में चुनाव आयुक्त से लेकर सबसे छोटा कर्मचारी निर्धारित टाईम लाईन में कुशलता से अपना सर्वोच्च देकर लोकतंत्र के पावन यज्ञ में अपनी आहुति देता है। राजनितिक दलो को यह याद रखना चाहिये चुनाव आयोग व उसकी प्रक्रिया पर अविश्वास यह उन सभी अधिकारियों और कर्मचारियों का भी अपमान है।

मंगलवार, 12 सितंबर 2017

#Who Killed Gauri Lankesh


गौरी लंकेश कर्नाटक की एक लेफ्टिस्ट फायर ब्रांड लेखिका थी। उन्होने शुरु में टाईम्स ऑफ इंडिया में काम किया तब उनकी शादी चिनानंद राजघट्ट से हुई वे भी पत्रकार थे दिल्ली में कुछ समय तक साथ काम भी किया। पर शादी ज्यादा चली नही और वे बेंगलुरु आ गयी उस समय वे संडे मेगेजीन में संवाददाता का काम कर रही थी।
 उनके पिता पी लंकेश भी एक जाने माने कन्नड़ जरनलिस्ट थे और लंकेश  के नाम से एक टेबलॉयड निकालते थे। गौरी लंकेश ने  सन 2000 में उनकी मृत्यु के बाद भाई इंद्रजीत लंकेश के प्रकाशक मुद्रण व व्ययसायिक दायित्व संभाले और गौरी लंकेश ने संपादन का कार्य किया। यह कुछ ज्यादा दिनो तक नही चला क्योंकि लंकेश पत्रिका की दोनो भाई बहन की विचारधारा में अत्यधिक फर्क होने से पत्रिका में रिपोर्टिंग को लेकर दोनो में अक्सर विवाद होते रहते थे सन 2005 में दोनो भाई बहन में अच्छी खासी लड़ाई हुई जिसमें पोलिस रिपोर्ट तक हुई एवं प्रेस कांफ्रेस कर इंद्रजीत ने अपनी स्थिती साफ की। इसके बाद लंकेश पत्रिका से अलग होकर अपनी गौरी लंकेश अपनी पत्रिका गौरी लंकेश पत्रिके के नाम से अलग से निकालने लगी।

गौरी लंकेश अपनी एक्स्ट्रीम एंटी राईट विचारधारा के लिये जानी जाती है। वह बगैर लाग लपेट के किसी के लिए कुछ भी लिख सकती थी बोल सकती थी और जब आप ऐसा करते है तो जाहिर है आप के दुश्मन दोस्तो से ज्यादा होते है। आरएसएस और बीजेपी की तो कट्टर दुश्मन थी ही उनके लिखे लेख कन्नड़ भाषी लोगो में बहुत पंसद किये जाते थे। लेकिन उनकी विचार धारा आरएसएस ब्राह्मण वाद के खिलाफ स्पष्ट थी और ऐसा बताया जाता है कि केरला कर्नाटक में किसी आरएसएस वाले की हत्या होने पर वह किसी न किसी बहाने सोशल मिडीया पर अपनी पत्रिका में पोस्ट डालकर न सिर्फ ऐसी हत्याओं का समर्थन करती बल्की खुशी भी जाहिर करती।


गौरी लंकेश नक्सली विचारधारा की तरफ रुझान रखती थी लेकिन वे सक्रिय रुप से  नक्सलियों को मुख्य विचारधारा में लाने की कोशिश करती रहती थी। उनके प्रयासो से कुछ नक्सलियों ने सरेंडर भी किया। जिस दिन उनकी हत्या हुई उस दिन उनके द्वारा दिन में किये गये दो ट्वीट बहुत महत्वपूर्ण है जिसमें वे अपने ही साथियों से गुजारिश कर रही है कि हम लोग गलती कर सकते है जैसे की फेक पोस्ट को शेयर करना. हम सब सावधान रहे और एक दूसरे को एक्सपोज न करें.....शांति कामरेड्स. दूसरा ट्वीट कुछ ऐसा है मैं ऐसा क्यों महसूस कर रही हूँ कि हममें से कुछ आपस में ही लड़ रहे है? हम हमारे सबसे बड़े शत्रु को जानते है क्या हम सबको उस पर ध्यान नही लगाना चाहियें. दोनो ट्वीट बताते है कि गौरी लंकेश अपने ही साथियों के कारण परेशान थी और काफी तनाव में थी। 

वो जानती थी कि जो कुछ वे कर रही है उससे उनकी जान को खतरा है। खासतौर से गौरी लंकेश नागाराजू, नूर जुल्फिकर श्रीधर, शिवू, रिजवान बेगम और कल्पना जैसे नक्सलियों से हिंसा का रास्ता छुड़ाने में कामयाब रही थीं। इसे लेकर ही उन्हें लगातार फोन पर धमकियां मिल रही थीं। विक्रम गौड़ा अपने हाथ से एक एक कर नक्सली साथियों को फिसलता देख कर गौरी लंकेश से काफी नाराज़ था। विक्रम गौड़ा केरल के उड्डुपी जिले का रहने वाला था जहाँ तमिलनाडु में नक्सली कमान कुप्पुस्वामी के हाथ में थी कर्नाटक का नक्सली प्रमुख विक्रम गौड़ा था। गौरी लंकेश के भाई का कहना है कि नक्सली लोगो से उसे धमकियां मिल रही थी।

खुद सिद्दरमैया ने बतायाकि गौरी लंकेश उनकी हत्या के दो तीन दिन पहले उनसे शाम के समय उनके बंगले पर मिली थी। बताया जाता है कि यह मुलाकात लगभग दो घंटे की थी। क्या यह सामान्य मुलकात थी या फिर गौरी लंकेश किसी खास काम से गयी थी। गौरी लंकेश ने वो कर्नाटक के कांग्रेसी विधायक डीके शिवाकुमार के खिलाफ एक मामले में जांच कर रही हैं। डीके शिवाकुमार वही विधायक हैं, जिनके रिसॉर्ट में गुजरात के कांग्रेसी विधायक रुके थे। उन पर सीबीआई के छापे भी पड़ चुके हैं। इसके अलावा कर्नाटक सरकार और मुख्यमंत्री सिद्धरमैया से जुड़े मामले भी गौरी लंकेश की पत्रिका में छपने वाले थे। यह जानना दिलचस्प होगा कि कर्नाटक मुख्यमंत्री सिद्दरमैया के बंगले से जब गौरी शंकर निकली तो किसी डील तय हो जाने से खुश थी या उनका चेहरा गुस्से से तमतमाया हुआ था। इस बात को वहाँ लगे सीसीटीवी फूटेज या उस वक्त ड्यूटी पर तैनात कर्मियों से जाना जा सकता है। मेरी समझ से मुख्यमंत्री बंगले के सीसीटीवी फूटेज का उस दिनांक का चेकिंग और कर्मचारियों का इंटरोग्रेशन होना बहुत जरुरी है।

लेकिन असली कातिल कौन है यह लाख टके का सवाल है। जब मैं सिलसिलेवार यह फेक्ट्स नरेट कर रहा हूँ तो मुझे ऐसा लग रहा है जैसे की कोई सस्पेंस फिल्म चल रही है जिसमें मुख्य किरदार की हत्या करने के हर किसी के पास कारण है। जाहिर है कि जिस किसी ने हत्या का षड़यंत्र रचा उसने इसके लिए पेशेवर हत्यारों को चुना ऐसा हम सब समझते है। अब जरा 5 सितंबर की शाम 7 बजे का घटनाक्रम देखे। गौरी लंकेश अपने घर राजराजश्वेरी नगर की और जा रही है कुछ कहते है कि उसने अपनी माँ को फोन कर कहा कि कुछ लोग मेरा पीछा कर रहे है। कन्हैया ने भी कहा कि गौरी लंकेश ने उसे कहा था कि कुछ सदिंग्ध लोग उसके घर के आसपास चक्कर लगाते देखे है।


 इसिलिए उसने हत्या के महज दो दिन पहले सीसीटीवी लगवाए थे जिसमें घर के एंट्रेंस व बरामदे में ही दो केमरे थे।




 घर के दरवाजे डबल थे याने एक जाली वाला और एक रुटीन फ्लश डोर। लगभग 7.30 शाम गौरी लंकेश अपने घर के आगे कार रोकती है यह स्पष्ट नही है कि उसने बाउंड्रीवाल का लोहे का गेट खोल कर कार अंदर रखी फिर या फिर कार बाहर छोड़कर और सदिंग्ध शख्सों को देख भाग कर दरवाजा खोलने का प्रयास किया। हत्या के तुरंत बाद की तस्वीरे बता रही है कि सफेद कार बाहर खड़ी है। लेकिन उसको पुलिस ने निकाल कर बाहर रखा यह भी हो सकता है। पुलिस का गैर पेशवराना तरीका शुरुआती तस्वीरों में साफ दिख रहा है पास पड़ोसी कुछ अधिकारी पुलिस के जवान कम से कम पचास से अधिक लोग घर के परिसर में आते जाते दिख रहे है। जबकि क्राइम सीन को तुरंत सील करना था। 







हमारे यहाँ क्राईम का एक हालिया सीन क्रिएट करना एवं संभावित अपराधियों की प्रोफाइलिंग करना बहुत दूर की बात है अभी हमने उपर तस्वीरों में देखा हर आदमी गौरी लंकेश के घर के परिसर में इस तरह आ जा रहा है जैसे  उसी का घर हो जबकी वहाँ हत्या जैसा गंभीर अपराध घटा है। 7 गोलियों में से तीन के खोल ऐसे ही इन लोगो के पैरो तले दब गये होगें। अब पता लगाना मुश्किल है कि तीन लोगो में से कितने लोग गोली चला रहे थे और गौरी लंकेश को एक शूटर की तीन गोलियाँ लगी या अलग अलग शूटरो की गोलियाँ लगी। गोलियों के खोल से यह भी पता चलता कि गोलियाँ देशी पिस्टल से चलायी गयी है या आथेंटिक रिवाल्वर या पिस्टल से 9 mm थी या फिर .33 या .35 रिवाल्वर थी। अब पुलिस कह रही है कि तीन शख्स थे हेलमेट लगाये हुए एक शख्स पहले से खड़ा था दूसरे दो स्कूटी से आये थे। पहले वाला कितनी देर से खड़ा था क्या सारे समय वह हेलमेट लगाये घूम रहा था अगर कोई ऐसा करता तो निश्चित तौर से किसी पड़ोसी ने देखा होता। मेरी समझ से स्कूटी लेकर कोई पेशेवर सुपारी कातिल हत्या करने नही जाएगा। हर पेशेवर हत्यारा जानता है कि गेट अवे व्हीकल विश्वसनीय एवं फास्ट होना चाहिये स्कूटी वाले को कोई भी पीछा कर पकड़ सकता है। दूसरी बात की कुल सात गोलियां चली जिसमें तीन गौरी लंकेश को लगी चार बरामदे की दीवार या दरवाजो में पेवस्त हो गयी। पुलिस के मुताबिक चार खाली कारतूस के खोल मिले। फिर बाकी तीन कारतूस के खोल कहाँ गये। अभी कहा जा रहा है कि हत्या में देशी पिस्तोल का इस्तेमाल हुआ है यह कुछ ऐसा ही जैसी दाभोलकर, पनसेरे और कलबर्गी की हत्याओं में हुए थे। 

यह अजीब बात है कि हत्यारों को  सात गोलियाँ चलानी पड़ी जाहिर है जब चार गोलियाँ चूक गयी तभी बाकी की तीन चलायी गयी इसका मतलब है कि उनमें से एक नौसिखिया था और पहले गोली चलाने का निर्देश उसको मिला होगा लेकिन वह घबरा गया और उसकी एक भी गोली निशाने पर नही लगी फिर उनमें से एक जरुर पेशेवर होगा जिसने ठीक से निशाने पर गोली चलायी। सिर और सिने में लगी गोली इस बात का सबूत है कि यह जरुर पेशेवर शूटर था। मुझे नही लगता तीसरे शख्स ने गोली चलायी होगी। तीन लोगो की थ्योरी कुछ जम नही रही है फिर भी यदि कोई तीसरा आदमी था तो वह बेकअप के लिए होगा और निश्चित रुप से किसी फोर व्हीलर में होगा क्योंकि आमतौर से खड़ी कार में चुपचाप बैठे शख्स पर किसी का शक नही जाता और स्कूटी पर तीन लोग भाग नही सकते। यदि वो आगे चल कर किसी फोर व्हीलर में बैठे तो यकीनन स्कूटी या बाइक किसी आस पास के इलाके में लावारिस मिलनी चाहिये या फिर किसी नजदीक के पार्किंग में। ऐसी कोई लावारिस व्हीकल यदि हो तो जाहिर है चोरी का होगा लेकिन फिर भी पुलिस अगर बेवकूफी न करे तो हत्यारों के फिंगर प्रिंट्स उठाये जा सकते है। फिंगर प्रिंट्स गौरी लंकेश की कार और बरामदे से भी उठाये जा रहे थे पर वहाँ बहुत से लोगो की मौजूदगी से वे कंटेमिनेटेड हो गये होगे और आरोपियों को सजा दिलाने में कामयाब नही होगे। तीन शख्स अगर है तो एक जरुर बेकअप होगा किसी कार में आसपास लगभग 30 से 40 मिनिट उस इलाके में रहा होगा। अगर किसी पड़ोसी या फिर कामवाली बाई नौकर, कोई खेलकर आता हुआ बच्चा यदि उसने कार को नोटिस किया होगा तो कुछ कामयाबी हाथ लग सकती है। जो दो शख्स स्कूटी पर हेलमेट लगाये हुए थे उनमें से एक 18-20 साल का लड़का दूसरा 30 साल के आसपास का एक्सपिरिंयस्ड शूटर होना चाहिये। ऐसे सभी हिस्ट्री शीटर की तलाश करना चाहिये जो इस प्रकार के प्रोफाइल में फिट बैठते हो। बेक अप वाला शख्स भी लगभग 30-35 साल के एज ग्रुप में होना चाहियें हो सकता है कि उसी ने हत्यारों को हायर किया हो इसलिए ये शख्स ऐसा होना चाहिये जिसके कान्टेक्ट व्हाइट कॉलर लोगो से और अपराध जगत दोनो में ही यह फ्रीली मूव करता हो।
यदि गौरी लंकेश के नक्सली साथियों का ही यह काम है तो मेरी समझ से उनको किलर हायर करने की जरुरत नही है उनके इसमें ही कई लोग ऐसे होगे जो बड़े इत्मीनान के साथ ऐसे काम को अंजाम दे सकते है। आधुनिक हथियारों की उनके पास कमी नही है। जिस तरह से ताबड़तोड़ 7 गोलियाँ चलायी गयी है उससे मुझे लगता है कि गोलियाँ किसी अंग्रेजी पिस्टल या रिवाल्वर से चली है। दो शूटरों ने लगभग 10 फीट की दूरी से गौरी लंकेश पर गोली चलायी क्योंकि हेलमेट पहने संदिग्ध व्यक्तियों को पास आता देख कर गौरी लंकेश कुछ न कुछ एक्शन लेती। लेकिन दोनो शूटरो में से एक ने पहले गोली चलायी जो उसे नही लगी गौरी लंकेश भाग कर घर के दरवाजे को खोलने का प्रयास कर रही थी लेकिन शूटर अब उनके नजदीक पहुँच गये थे और निशाना सही बैठा। लेकिन फिर भी मर्डर पाईंट ब्लैंक रेंज से नही किया गया। जब गौरी लंकेश दरवाजे के पास होगी तब शूटर बरामदे के जस्ट बाहर ही होना चाहिये।
अगर नक्सलियों ने यह वारदात की है तो उनके पास इसको करने के लिए मोटिव, हथियार और मेन पॉवर सब आसानी से था सिर्फ उनको बेक अप के लिए बेंगलुरु में रहने वाला शख्स चाहिये था जो अच्छी तरह से रास्तो से वाफिक हो। जहाँ तक मुझे जानकारी है कर्नाटक पुलिस भी इसी थ्योरी पर काम कर रही है।

अभी बीजेपी, आरएसएस अपने केरियर के शिखर पर है वो ऐसी आलोचनाओं से डरते भी नही है और बरदाश्त करने की ताकत ज्यादा है फिर भी अगर वे लोग ऐसा करना चाहे तो उनसे सहानुभूती रखने वाले ऐसे हार्ड कोर लोग है वे संसाधन भी जुटा सकते है लेकिन यह काम एक दो दिन का नही है और यह लगभग एक-दो महीने की रेकी प्लानिंग से किया गया काम है। पुलिस चाहे तो ऐसे हार्ड कोर एक्टीविस्ट की पिछले दो तीन महीनो की एक्टीवीटी खंगाल सकती है जोएक दो महीने से बेंगलुरु में रह रहे हो।
 गौरी लंकेश कांग्रेस की एमएलए शिवराजा पर भ्रष्टाचार के सबंध में कुछ काम कर रही थी। सिद्दरमैया सरकार के भी कुछ मुद्दे थे गौरी शंकर दो तीन पहले सिद्दरमैया से मिलने उनके बंगले पर भी गयी थी और दो तीन दिन से यानी 5 सितंबर के दो तीन दिन पहले से ही वो तनाव में थी सुरक्षा के प्रति चिंतित भी थी और गौरी लंकेश के साथ वही हुआ जिसकी उसे आशंका थी। शिवकुमार एक सक्षम तेज तर्रार पैसे वाला और जमीन से खड़ा हुआ एमएलए है। उनमें यह ताकत है और पैसा संसाधन मेन पॉवर सब कुछ है और ऐसे राजनितिक माहौल में जिसमें आरोप बीजेपी और आरएसएस पर लगने वाला है। लेकिन अगर यह पोलिटिकली मोटिवेटेड मर्डर है तो हम अगर कातिलों को पकड़ भी ले असली षड़यंत्रकारियों तक कभी पहुँच नही पाएगी। 


  

इंद्रजीत के पास ऐसा कोई कारण नही कि वो अपनी बहन के साथ ऐसा करें। फिर इंद्रजीत के लिए एक इनविड्युल के बतौर शूटर हायर करना केश पेमेंट का बंदोबस्त करना कठिन काम है। इंद्रजीत जानता है कि हत्या करने में किन लोगो का हाथ हो सकता है इसलिए एंटी मोदी मिडिया के लाख चिल्लाने के बावजूद भी उसने एक बार भी बीजेपी का नाम नही लिया और सीबीआई जाँच की मांग कर रहा है अगर उसको जरा भी शक होता कि इसके पिछे बीजेपी या आरएसएस का हाथ है तो वो कभी सीबीआई जाँच की मांग नही करता क्योंकि केन्द्र में बीजेपी की सरकार है और ऐसी स्थिति में जाँच में ढिलाई तो की ही जा सकती है उसके उलट इंद्रजीत को कांग्रेस की लोकल गवरमेंट और पुलिस पर कम विश्वास है हाँलाकि सिद्दरमैया ने लोकल एसआईटी गठन की है पर शुरुआत में ही आधे सबूत तो खो ही चुके है।

जो भी हो गौरी लंकेश एक खूबसूरत शख्सि़यत थी खास बात यह थी कि वे जानती थी कि जो कुछ वे कर रही है उसका अंजाम खतरनाक हो सकता है ऐसे अजांम की उनको आशंका भी थी। लेकिन फिर भी वे जिद्दी थी और मरते दम अपनी बात पर अड़ी रही अपनी विचार धारा से कभी समझौता नही किया। ऐसे लोग दुनिया में कम ही होते है और अक्सर जल्दी चले भी जाते है।
अब सारे तथ्य आपके सामने है आप ही फैसला कर सकते गौरी लंकेश का कौन कातिल है।
मेरी विनम्र श्रद्धांजलि